पानी का बहाव अधिक होने पर सिक्के और सोने-चांदी के कणों को बीनना मुश्किल होता है। इसके लिए लैंस वाले बड़े शीशे का इस्तेमाल करते हैं। शीशा पानी में डालते ही पानी के नीचे सिक्के और कण चमकते और बड़े नजर आते हैं। जिससे वो आसानी से उनको निकाल लेते हैं।
गंगा बंदी के बाद सिक्कों और सोने-चांदी के आभूषण के कटपीस एवं कणों को बीनना आसान हो जाता है। आजकल युवाओं के अलावा बच्चे और महिलाएं भी इस काम में जुटे हैं। कइयों का पूरा परिवार ही इसमें लग जाता है। बीनने वाले अधिकतर लोग चंडीघाट, खड़खड़ी, भीमगोड़ा और रोड़ीबेलवाला की झुग्गी बस्तियों में रहते हैं।
भाई गौतम के साथ रोजाना गंगा घाटों से सिक्के और चांदी व सोने के कण बीनता हूं। किसी दिन एक हजार तो कभी 1200 के सिक्के जमा कर लेता हूं। अभी तक 100 ग्राम चांदी और पांच ग्राम सोना एकत्र कर लिया है।
- दुर्गेश, चंडीघाट
गंगा जी से सोने और चांदी के कटपीस व कण मिलते हैं। सोना तीन हजार रुपये प्रति ग्राम बेचते हैं। आमतौर पर सोना व चांदी कभी कभार ही मिलता है। जिसे मिल जाए उसकी लाटरी निकल आती है। सोना-चांदी सुनार को बेचते हैं।
- गौतम, चंडीघाट
गंगा से ही परिवार पलता है। सालभर सिक्के और सोने-चांदी के कण एकत्र करते हैं। दहशरे के बाद घाटों का जलस्तर कम होने से आसानी हो जाती है। जितना भी सिक्के और सोना-चांदी एकत्र करते हैं दीपावली का खर्च निकल जाता है।
- रोहित कुमार, खड़खड़ी
सुबह दस से शाम पांच बजे तक रोजाना सिक्के बीनते हैं। किसी दिन एक हजार से अधिक मिल जाते हैं तो कभी कुछ देर में ही सोने-चांदी के कण हाथ लग जाते हैं। इससे सैकड़ों लोगों का परिवार पलता है।
- बिहारी लाल, रोड़ीबेलवाला