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'फांसी' नहीं अपराधी के हारमोन ही बदल डालो!

Fri, 27 Sep 2013 11:12 PM IST
अमर उजाला, हल्द्वानी
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हमारे पास पहले ही सख्त कानूनों की कमी नहीं है। इससे अपराध रुकता तो निर्भया कांड के बाद गुस्सा देखकर कोई बलात्कार नहीं करता, लेकिन अपराध की प्रवृत्ति नहीं बदली।
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इसे समझने की आज कहीं कोशिश नहीं हो रही। दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को फांसी की सजा दी गई, लेकिन क्या उनका मनोविज्ञान जानना जरूरी नहीं था? उनका मनोविज्ञान पढ़कर हम पता कर सकते थे कि किन परिस्थितियों ने उन्हें इतना हिंसक बनाया।

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हारमोन बदलने से बदलेगी प्रवृत्ति
यह एक आसान तरीका होता अपराध रोकने का बजाय इसके कि हम भय पैदा करें। यह कहना है पंजाब मेडिकल काउंसिल के रजिस्टार डा. एस थिंड का।

डॉ. थिंड कहते हैं कि अपराध नियंत्रण के और भी कई तरीके हैं। अपराधियों के हारमोन बदलकर भी उनकी प्रवृत्ति बदली जा सकती है।

पश्चिमी देशों में इन तरीकों का इस्तेमाल काफी कारगर साबित हुआ है। मनोविज्ञान केवल अपराधी का ही नहीं पीड़ित का भी पढ़ा जाना चाहिए। इससे कई बार बेगुनाह बच सकता है।
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डराकर अपराधी नहीं मानेंगे
एसजीटी मेडिकल कालेज गुड़गांव के कुलपति डॉ. टीडी डोगरा कहते हैं कि डराकर अपराध नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अपराध क्यों बढ़ा इसे समझना होगा। समाज में आए बदलाव का नतीजा है अपराध। परंपराएं, मान्यताएं और नियमों को भूल गए हैं लोग। यह कानून से नियंत्रित नहीं होने वाला।

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अभियान चलाना होगा जैसे विवेकानंद आदि ने चलाया था। इसके लिए एक समाज तैयार करना होगा जिसमें अपराधी डरे। यही नहीं फोरेंसिक के महत्व को भी समझने की जरूरत है। हर जिले में एक फोरेंसिक सेंटर स्थापित किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, अगर फोरेंसिक को मजबूत किया जाएगा तो इससे न्याय भी जल्द होगा।

न्यायिक प्रक्रिया में नहीं उलझना चाहते डाक्टर
पीजीआई चंडीगढ़ में फोरेंसिक मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डॉ. दलबीर सिंह कहते हैं फोरेंसिक में डाक्टर पुलिस का भी काम करते हैं। इसके बावजूद अपराध नियंत्रण की सबसे मजबूत शाखा को आगे बढ़ाने के लिए अब तक कोई बेहतर काम नहीं हुआ।

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इस विधा पर काम करने वाले लोगों की आज भी देश में बड़ी कमी है, जबकि बगैर फोरेंसिक के अपराधी तक पहुंचने की संभावना बहुत कम है। क्योंकि किसी भी घटना के बाद सबूत एकत्र करना आदि फोरेंसिक का काम है। लंबी न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए भी युवा फोरेंसिक साइंस के क्षेत्र में नहीं आ रहे। इसके अलावा इस क्षेत्र में उतना पैसा और ग्लैमर भी नहीं।

दस हजार केस निपटा चुके है रानीखेत के जोशी
रानीखेत के बिंता गांव में जन्मे एमसी जोशी केंद्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला में सह निदेशक हैं। श्री जोशी की पढ़ाई जीआईसी और डिग्री कालेज पिथौरागढ़ से हुई। श्री जोशी कहते हैं कि सफेदपोश अपराध को रोकना भी बेहद जरूरी है। कागजों में हेरफेर कर होने वाला खेल को रोकने के लिए भी कोशिश करनी होगी। वह अब तक भ्रष्टाचार से संबंधित दस हजार से अधिक केस सुलझा चुके हैं।
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