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उत्तराख्ांडः जंगल में सोना मना है...

Sun, 30 Jun 2013 07:54 PM IST
सुधाकर भट्ट
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पांडुकेश्वर लाइव
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बदरीनाथ से पैदल निकलने वाले यात्रियों को पता ही नहीं होता कि उनकी राहों में कितनी दुश्वारियां हैं। इतना ही नहीं हर कदम पर एक चुनौती सुरसा की तरह मुंह फैलाए खड़ी मिलती है। बताने वाले तो कह रहे हैं कि कुछ खास मुश्किल नहीं बदरीनाथ से जोशीमठ पहुंचाना। जो निकल जाता है इस भुलावे में आकर वही समझता है कि कहना कितना आसान था, और चलना उतना ही मुश्किल।

लामबागड़ में अलकनंदा के तट पर जब वह खुले आकाश के नीचे सोने की कोशिश करता है तो अलकनंदा की गर्जन उसे रह रहकर उसे एहसास कराती है कि जंगल में सोना मना है। वहीं चढ़ाई के समय जब फेफड़े भी साथ छोड़ने लगते हैं और वह रुककर फेफड़ों को राहत देने की कोशिश करता है तो जंगल का डर उसे रुकने नहीं देते।
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कभी अपने ईष्ट देव तो कभी किस्मत की गुहार लगाते जब वह जोशीमठ पहुंचता है तो अपनी आपबीती सुनाते समय वह जरूर कहता है कि हमें तो विश्वास ही नहीं था कि हम पहुंच जाएंगे। जब वह इन बातों को दोहरा रहा होता है तो उसके चेहरे पर पूरी आपदा स्पष्ट नजर आती है।

बदरीनाथ में लाइट है और यहां घुप अंधेरा
बदरीनाथ से करीब 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है हनुमान चट्टी। ऐसी चट्टी (मेन सड़क पर एक छोटा पड़ाव) जहां एक डाकघर, पुलिस चौकी, एक मंदिर और दो-तीन चाय की दुकानों को छोड़कर कुछ नहीं है। बिजली 16-17 जून की रात से ही गायब है। छह बजे यहां सन्नाटा हो जाता है। बदरीनाथ में लाइट है और यहां घुप अंधेरा।

बदरीनाथ से पैदल चलकर यहां पहुंचने वाले किसी भी यात्री के लिए पहला पड़ाव है। अगर आप बदरीनाथ से सुबह चले हैं तो दो घंटे में शार्टकट से यहां पहुंच जाएंगे। पहाड़ी रास्तों की जानकारी न हो तो चार घंटे लगेंगे। किस्मत ने साथ दिया तो आर्मी का कोई वाहन मिल सकता है।

परेशानी की यात्रा इसके बाद ही शुरू होती है। खीरों गांव के ठीक नीचे करीब चार किलोमीटर सड़क पूरी तरह से बह चुकी है। लिहाजा आपको जंगल का सहारा लेना पड़ता है। जंगल भी ऐसा कि पेड़-पौधों के बीच हाथ को हाथ न सुझाई दे। रास्ता कहीं पर तीखी उतराई तो कहीं सीधी चढ़ाई।

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कहने को सेना के जवान यहां रास्ता बना रहे हैं पर नदी हर रात अपना रास्ता बदल रही है। लिहाजा बनाए गए रास्ते का सुबह कोई पता ही नहीं मिलता। हनुमान चट्टी से लामबगड़ के बीच इस रास्ते को एक घंटे का होना चाहिए। पर कई यात्रियों के लिए यह रात गुजारने का सबब बन जाता है।

जंगलों में भटक-भटक कर किसी तरह से यात्री लामबगड़ पहुंचता भी है तो उसका सामना उफनती, गरजती अलकनंदा से होती है। बात यहीं खत्म नहीं होती। नदी को पार करने के लिए आपको यहां भी किस्मत का साथ जरूरी है। अगर मौसम साफ है तो हेलीकाप्टर नदी पार पहुंचा सकता है।

यह हेलीकाप्टर भी एक बार में तीन ही आदमियों को ले जा पाता है। यह विकल्प नहीं है तो रस्सी के सहारे आपको नदी पार करनी होगी। आईटीबीपी के जवान इसमें लगे हुए हैं। पर मुसीबत यह है कि पार करने वाले ज्यादा है और पार कराने वाले कम।। लिहाजा आपकी बारी में कम से कम तीन घंटे लगने तो स्वाभाविक है।

यहां पर सेना ने एक पुल भी बनाया है पर तेज बहाव के कारण यह पुल एक तरफ झुक गया है। लिहाजा पुल से नदी पार करने से पहले सेना के जवानों की अनुमति लेनी होगी। यह उनके रिस्क और मूड पर निर्भर करता है। यदि नदी पर कर भी गए तो भी यहां रात बिताने की समस्या आपके सामने होगी।

मुसीबत यहीं पर खत्म नहीं हो जाती। इसके बाद करीब चार किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता है जो आपका इंतजार कर रहा है। चढ़ने और उतरने की यह कसरत ऐसे लोगों पर बेहद भारी पड़ती है जो बीवी-बच्चों के साथ हैं और जो सामान्य स्थितियों में सीढ़ी चढ़ना भी पसंद नहीं करते। अच्छी बात यह है कि इस रास्ते पर सेना के जवान मौजूद हैं जो आपको मुसीबत के समय सहारा दे सकते हैं।

पांडुकेश्वर में लाइट पहुंच चुकी है
इस रास्ते को पार कर आप पांडुकेश्वर पहुंचते हैं। पांडुकेश्वर में अब लाइट पहुंच चुकी है और दो तीन धर्मशालाएं भी हैं, यहां से आगे बढ़ते ही फिर करीब डेढ़ किलोमीटर की सड़क गायब है। लिहाजा एक बार फिर खड़ी चढ़ाई आपका इंतजार कर रही होती है। करीब एक किलोमीटर ऊपर चढ़ने के बाद आपको एक किलोमीटर सीधे उतरना भी है। यहां पर सड़क के टूटे हिस्से पर एक पतला रास्ता बनाया गया है पर यह सीधा कम खतरनाक ज्यादा है। क्योंकि, इस रास्ते पर ऊपर से लगातार भूस्खलन जारी है।

इस रास्ते को पार करने के बाद अब गोविंदघाट पहुंच जाते हैं। पर दुश्वारियां हैं कि जाने का नाम नहीं लेती। सड़क टूटी हुई है और यहां से निकलने के लिए आपके सामने एक मात्र विकल्प पहाड़ी रास्ता ही है। यहां से आप निकले तो खुली चौड़ी सड़क पर हैं। पर यह सड़क भी आपको एक और चढ़ाई की तरफ ही ले जाती है।
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यह एक किलोमीटर से अधिक की खड़ी चढ़ाई है जिसे आपको पार करना है। चढ़ने के बाद उतरना भी पड़ेगा। इसे पार करने के बाद आपको जोशीमठ पहुंचाने के लिए एक वाहन की तलाश करनी होगी। जिसके मिलने की संभावना ज्यादा है और आप सुरक्षित जोशीमठ पहुंच कर खतरे की जद से काफी हद तक बाहर हो जाते हैं।
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