उत्तराखंड सरकार ने दल बदल विरोधी कानून को लेकर भेजे नोटिस को बड़ी समझदारी से ड्राफ्ट किया।
नौ बागी विधायकों पर व्हिप के उल्लंघन को आधार बनाने से भले उनकी सदस्यता समाप्त करने की अंश भर गुंजाइश नहीं बचती, लेकिन सरकार के लिए वैधानिक दिक्कतें खड़ी हो जाती।
सदस्य के आचरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने रवि नायक बनाम भारत सरकार वाद में जो फैसला दिया है उसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सदस्यता समाप्त करने के लिए सदस्य के आचरण को आधार माना है। ऐसे में अगर मुख्य सचेतक की ओर से जारी नोटिस में आचरण के पर्याप्त साक्ष्य होंगे तो पीठ तत्काल सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर देगी।
किसी भी विधानसभा सदस्य के डिस्क्वालीफाई करने के पीछे संविधान के शिड्यूल 10 में परिभाषा है कि अगर वह स्वेच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ दे और दूसरा पार्टी व्हिप का उल्लंघन कर डाले। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रवि नायक बनाम भारत सरकार वाद में साफ दिया है केवल दल बदल के दायरे में दी परिभाषा आती है बल्कि आचरण भी इसका हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में स्पष्ट है कि अगर सदस्य पार्टी से त्यागपत्र दिए बिना भी ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देता है, जिसके निहितार्थ उसके आचरण से निकाले जा सके कि उसने त्यागपत्र दिए बगैर स्वेच्छा से पार्टी छोड़ दी है, जिससे वह संबंध रखता है। यानि पार्टी से त्यागपत्र या व्हिप को न मानने के अलावा उसका आचरण भी पार्टी संविधान के अनुरूप है।
उत्तराखंड के नौ बागियों के आचरण को मुख्य सचेतक इंदिरा हृदयेश ने इसीलिए आधार बनाया है। बागियों का राजभवन में भाजपा के साथ जाना और राज्यपाल से कांग्रेस सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में सहभागिता देना आचरण को संदिग्ध बनता है। अगर यह तथ्य मुख्य सचेतक विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष पेश करने में कामयाब होते है तो दल बदल कानून के तहत कार्यवाही निश्चित है।
14 दिन तक अध्यक्ष के पास अधिकार
अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आने के बाद 14 दिन बाद ही राज्यपाल उसमें दखल कर सकते हैं। राजभवन के 28 मार्च तक सरकार को बहुमत साबित करने का मौका देने से पीठ पर अविश्वास का संकट टल जाएगा।
विपक्ष सदन में इस मामले को खिलाफ हंगामा तो कर सकता है, लेकिन अध्यक्ष के खिलाफ दिए प्रस्ताव पर राजभवन दो अप्रैल तक दखल नहीं दे सकता। ऐसे में अध्यक्ष दल बदल कानून के तहत कार्यवाही करने के साथ बहुमत की कार्यवाही का संचालन संवैधानिक दायरे में रहकर कर पाएंगे।
रणनीति के लिहाज से 26 की डेडलाइन
कांग्रेस ने दल बदल विधेयक के तहत जो 26 मार्च की डेडलाइन बागी विधायकों को दी है उसके पीछे गहरी राजनीति है। राजभवन से बहुमत साबित करने के लिए 28 मार्च तक का समय है। ऐसे में कांग्रेस 26 को अंतिम स्थिति भांप लेगी। अगर बागी उससे पहले टूट गए तो बहुमत का रास्ता साफ अगर नहीं टूटे तो दल बदल विधेयक के तहत कार्रवाई कर सरकार अल्पमत से निकलेगी। 28 मार्च को जब सदन जुटेगा तो बागियों का पत्ता साफ कर दिया जाएगा।