चंपावत। जिले में चाय विकास बोर्ड की ओर से चाय बागानों को टी टूरिज्म के रूप में विकसित किया जा रहा है। जिले में वर्तमान में 24 ग्राम पंचायतों में 235 हेक्टेयर क्षेत्रफल में चाय बागान विकसित कर ग्रीन लीफ (हरी पत्ती) चाय का सफलतापूर्वक उत्पादन किया जा रहा है।
पर्यटन विकास विभाग की ओर से चाय बागानों से जुड़े काश्तकारों के पैतृक मकानों को होम स्टे योजना का लाभ देकर आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा रहा है। बोर्ड की ओर से विभिन्न स्थानों में 30 साल के लिए लीज पर ली गई भूमि में नए चाय बागान विकसित किए जा रहे हैं। बोर्ड के प्रबंधक डेसमेंस ने बताया कि चाय विकास बोर्ड निरंतर अपने उत्पादन में गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रयासरत है। बागानों में ब्लैक टी के अलावा वाइट टी का भी उत्पादन किया जा रहा है। जल्द ही जैविक ग्रीन टी का भी उत्पादन प्रारंभ किया जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में चंपावत चाय बागानों में निर्मित चाय को उत्तराखंड टी के ब्रांड नाम से बेचा जा रहा है। इस ब्रांड को लोकप्रिय करने के लिए दार्जिलिंग टी की तर्ज पर जीआई (ज्योग्राफिकल इंडीफिकेशन) करवाया जाना प्रस्तावित है। संवाद
चंपावत में इन स्थानों में विकसित किए जा रहे हैं बागान
चंपावत। जिले में चाय विकास बोर्ड की ओर से शिलिंगटाक, छीड़ापानी और मुडियानी के अलावा च्यूराखर्क, लमाई, चौकी, भगाना भंडारी, लधौन टुकड़ा, मौराड़ी, नरसिंहडंांडा, चौड़ा राजपुरा, गड़कोट, कालूखान, मझेड़ा, खेतीगाढ़, गोशनी, बलांई, एसडीएम कोर्ट लोहाघाट, खूना, फोर्ती, मंच, डिगडई, मानढूंगा, कठनौली, बापरू और दिगालीचौड़ में चाय बागान विकसित किए जा रहे हैं।
पहले सात साल की होती थी लीज
चंपावत। जिले में 1996 से शुरू हुए चाय बागान लगाने के कार्य में चाय बोर्ड की ओर से सात साल पर काश्तकारों की भूमि लीज पर लेकर उसमें चाय बागान विकसित कर आठवें साल काश्तकारों को सौंप दिया जाता था। लेकिन वर्ष 2018 के बाद लीज की प्रक्रिया को संशोधित कर सात वर्ष के स्थान पर तीस वर्ष कर दिया गया है।