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नेपाल के खल्ला में है बाबा सिद्धनाथ का मूल मंदिर

Tue, 05 Apr 2016 10:16 PM IST
ब्यूराे/अमर उजाला, चंपावत
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नेपाल के खल्ला में है बाबा सिद्धनाथ का मूल मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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 मां पूर्णागिरि धाम का महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बाबा सिद्धनाथ के मूल मंदिर में अब बहुत कम श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। शारदा नदी के पार नेपाल में स्थित बाबा सिद्धनाथ का मूल मंदिर ब्रह्मदेव में नहीं, बल्कि ब्रह्मदेव से करीब सात किमी दूर खल्ला नामक स्थान पर स्थापित हैं। दुर्गम मार्ग होने के कारण यात्रियों की सुविधा के लिए करीब डेढ़ दशक पहले नेपाल के ब्रह्मदेव और महेंद्रनगर में मंदिर स्थापित किए गए हैं।
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मां पूर्णागिरि धाम के साथ बाबा सिद्धनाथ का महात्म भी जुड़ा है। कहा जाता है कि बाबा सिद्धनाथ मां पूर्णागिरि के भक्त थे, जो नित्य देवी के दर्शन के लिए दरबार में हाजिरी लगाते थे। मान्यता है कि एक दिन देवी पूर्णागिरि अपने शयन कक्ष में शृंगार कर रही थीं कि इस बीच अचानक बाबा सिद्धनाथ देवी के शयन कक्ष में प्रवेश कर गए, जिससे क्रोधित होकर देवी ने बाबा के शरीर के टुकड़े कर हवा में उछाल दिए। जब देवी को पता चला कि शयनकक्ष में प्रवेश करने वाला कोई और नहीं उनके अनन्य भक्त बाबा सिद्धनाथ थे तो देवी को पछतावा हुआ। तब देवी ने बाबा को वरदान दिया कि मेरे दर्शन के बाद बाबा के दर्शन करने से ही श्रद्धालुओं की यात्रा और मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।

बताया जाता है कि बाबा सिद्धनाथ के शरीर के टुकड़े जहां-जहां गिरे वहां उनके मंदिर स्थापित हुए है। पूर्णागिरि धाम के ठीक सामने नेपाल के खल्ला नामक स्थान पर बाबा सिद्धनाथ का मूल मंदिर स्थापित हैं, जहां अब वही भक्त दर्शन को पहुंचता हैं जिसे इस मूल मंदिर के महात्म की जानकारी है। बाबा के मूल मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम होने के कारण करीब 16 साल पहले संवत 2056 में ब्रह्मदेव और महेंद्रनगर में बाबा सिद्धनाथ के मंदिर स्थापित किए गए। मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद बाबा सिद्धनाथ के इन मंदिरों में दर्शन कर श्रद्धालु अपनी यात्रा को पूर्ण करते हैं।
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मंदिर में चढ़ावे के मिले हैं सत्रहवीं शताब्दी के सिक्के
नेपाल के खल्ला नामक स्थान में स्थित बाबा सिद्धनाथ के मूल मंदिर के पुजारी पं. दिवाकर चटौत हैं और माई नर्मदा पुरी जी भी मंदिर में पूजा-अर्चना करती हैं। माई नर्मदा पुरी जी का कहना है कि वे 35 साल से इस मंदिर में पूजा-पाठ कर रही हैं। पूर्व में मां पूर्णागिरि के दर्शन को आने वाले यात्री बड़ी संख्या में यहां आते थे, लेकिन अब बहुत कम श्रद्धालु ही बाबा के दर्शन को इस मंदिर में आते हैं। उनके मुताबिक मंदिर के चढ़ाने में सत्रहवीं शताब्दी के सिक्के भी मिले हैं, जो इस मंदिर के प्राचीन होने का प्रमाण है।
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