चंपावत। जंगल में आग के लिए सबसे बड़ा खतरा बना पिरूल (चीड़ का पत्ता) अब जंगलों को जलाने के बजाय लोगों की जिंदगी में उजाला करेगा। खेतीखान क्षेत्र में अब पिरूल से उत्पाद बनने लगे हैं। बाएफ फाउंडेशन डेवलपमेंट फाउंडेशन और एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप ने ये नई पहल की है। खेतीखान क्षेत्र की 30 महिलाओं को इस काम से जोड़ा गया है। ये महिलाएं पिरूल से औसतन रोजाना 15 टोकरियां और दूसरे उत्पाद बना रहीं हैं। इससे एक महिला एक माह में तीन हजार से पांच हजार रुपये तक कमा रहीं हैं।
एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप की डॉ. नूूपुर खेतीखान क्षेत्र में 30 महिलाओं को चीड़ के पिरूल से टोकरी, कंडी, पूजा थाली आदि उत्पाद के निर्माण को प्रेरित कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने खेती, पशुपालन से जुड़ी कामकाजी महिलाओं को प्रशिक्षण दिलाया। अब तीन माह से ये महिलाएं इन उत्पादों को तैयार कर रहीं हैं। इन उत्पादों की नैनीताल, अल्मोड़ा आदि पर्यटक स्थलों समेत ऑनलाइन भी बेचा जा रहा है। दीपा फर्त्याल, सुनीता मौनी, निकिता कर्नाटक, उषा महरा आदि का कहना है कि घरेलू काम निपटाने के बाद बचे वक्त में दो दिन (पांच से छह घंटे) में एक टोकरी बना लेतीं हैं।
डॉ. नूूपुर बताती हैं कि कोरोना के कारण दूसरी जगह काम करने वाले लोगों के घर लौटने से उत्पन्न हालात को देखते हुए पिछले साल नवंबर में स्वरोजगार के लिए ये विचार आया। पिरूल से सामग्री बनाने का काम मामूली प्रशिक्षण में शुरू किया जा सकता था। कच्चे माल की प्रचुरता और पूंजी के बिना स्वरोजगार शुरू होने के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए उपयोगी था। एडीएम टीएस मर्तोलिया का कहना है कि पिरूल से उत्पादों का निर्माण अच्छी पहल है। इससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी। (संवाद)
पिरूल से ऐसे तैयार हो रही सामग्री
चंपावत। खेतीखान में महिलाएं पिरूल से टोकरी, कंडी, पूजा थाली आदि हस्तशिल्प संबंधी उत्पाद बना रहीं हैं। बेसिक प्रशिक्षण देने के बाद स्क्रीनिंग के जरिये महिलाओं को तैयार किया गया है। पहले चरण में महिलाएं जंगल जाकर पिरूल को एकत्र करतीं हैं। फिर इस पिरूल को सुई और धागे के जरिये पिरो नए-नए आकार देतीं हैं। (संवाद)
जिले में 33 प्रतिशत से अधिक में है चीड़
चंपावत। जिले में 80549.10 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल है। इसमें से 27292.75 हेक्टेयर (33.88 प्रतिशत) में चीड़ है। ये ज्वलनशील चीड़ जंगल में आग का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। चंपावत, लोहाघाट, काली कुमाऊं, देवीधुरा, भिंगराड़ा वन क्षेत्र में मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। पहाड़ में पिरूल का उपयोग पशुओं के बिछावन के लिए भी किया जाता है। उरेडा के पीओ मनोज कुमार बजेठा का कहना है कि पिरूल से बिजली उत्पादन के जरिये रोजगार सृजन का प्रस्ताव है। पत्तियों से बनने वाला पिरूल ऊर्जा का बड़ा स्रोत है। अभी इस दिशा में काम होना बाकी है। (संवाद)
पिरूल से बनने वाले उत्पाद क्षेत्र में कई तरह से गुणात्मक बदलाव करेंगे। इससे महिला स्वरोजगार, ग्रामीण आर्थिकी को विस्तार मिल रहा है, बल्कि भविष्य में पिरूल से होने वाले नुकसान से भी निजात मिल सकेगी। जंगल की आग से होने वाली क्षति कम होने से वनों की सुरक्षा में मदद मिलेगी। खेतीखान के गांवों में इस प्रयोग के सफल होने के बाद दूसरी जगह भी इसे आगे बढ़ाया जाएगा।
- डॉ. नूूपुर, फेलो, एसबीआई यूथ फॉर इंडिया, खेतीखान।