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यहां धर्म है लेकिन अर्थ की चाह नहीं...

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चंद्रशेखर जोशी
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पूर्णागिरि धाम (चंपावत)। प्रदेश के प्रमुख धर्मस्थल मां पूर्णागिरि धाम की यात्रा के तरीके में भी बदलाव हुआ है। कभी टनकपुर से ही दो दिन में पूरी होने वाली यह धर्मयात्रा अब चार घंटे में पूरी हो जाती है लेकिन इस बदलाव और सुविधाओं के विस्तार के बीच आस्था के इस धाम में यहां मिलने वाली निशुल्क आवासीय व्यवस्था नहीं बदली है।
होली के बाद से शुरू हो करीब तीन महीने तक चलने वाले मेले में 30 लाख से अधिक श्रद्धालु देवी दर्शन करते हैं। कोरोना से दो साल प्रभावित होने के बाद इस बार 19 मार्च से शुरू हुआ यह मेला 15 जून तक चलेगा। इस मेले में पुजारियों ने श्रद्धालुओं के लिए पारंपरिक रूप से निशुल्क आवासीय व्यवस्था की है। ठुलीगाड़ से मुख्य मंदिर तक के 11 किमी क्षेत्र में श्रद्धालुओं को रहने के लिए किराये के लिए एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ता है। मेला क्षेत्र में पुजारी समाज की करीब 250 दुकानें हैं। इन दुकानों में 20 से 100 लोगों के रुकने की व्यवस्था है। ज्यादातर दुकानें प्रसाद की हैं। इन दुकानों में श्रद्धालुओं के लिए बिस्तर से लेकर ठहरने की व्यवस्था पुजारी और व्यापारी करते हैं।
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सुविधाओं की कमी से शुरू हुई थी परंपरा
पूर्णागिरि धाम (चंपावत)। मां पूर्णागिरि धाम की निशुल्क आवासीय व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। मंदिर समिति के अध्यक्ष पंडित किशन तिवारी, पूर्व ग्राम प्रधान पंडित मथुरा दत्त पांडेय आदि बताते हैं कि वर्ष 1970 से पहले तक सड़क और अन्य सुविधाएं न होने से देवी दरबार में आने के लिए टनकपुर से पैदल आना होता था। तब सिर्फ चैत्र और शारदीय नवरात्र में मुख्य रूप से तीर्थयात्री पहुंचते थे। कठिन आवाजाही के बीच श्रद्धालुओं को रात में रुकना होता था। पूर्णागिरि के पुजारी श्रद्धालुओं को यजमान मान रहने और खाने की व्यवस्था करते थे। असुविधाओं के कारण शुरू ये परंपरा सुविधाएं बढ़ने के बावजूद बदस्तूर जारी है।
आवास की निशुल्क सुविधा यहां के व्यापारी सहर्ष देते हैं। इसमें एक बदलाव यह हुआ कि ठहरने वालों को देवी को चढ़ाने के लिए प्रसाद ले जाना होता है। प्रसाद कितने का लेना है, इसकी बाध्यता नहीं है। पुजारी वर्ग के व्यापारी हर साल अधिक से अधिक सुविधाएं श्रद्धालुओं को देने का प्रयास करते हैं।
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- पंडित मोहन चंद्र पांडेय, पुजारी और व्यापारी।
धाम में श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क आवास की यह व्यवस्था पुरातन प्रथा का हिस्सा है। इस प्रथा को यहां के पुजारी और व्यापारी समाज ने समय बदलने के बावजूद बरकरार रखा है। इसी वजह से अब भी दुकानों को धर्मशाला कहा जाता है लेकिन इसमें किसी तरह का दान नहीं लिया जाता है।
- पंडित किशन तिवारी, अध्यक्ष, पूर्णागिरि मंदिर समिति।
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