उत्तराखंड में पिछले एक महीने में घटा राजनीतिक घटनाक्रम भाजपा के लिए 'बर्र' का छत्ता साबित हुआ। सत्ता पाने के लिए हरीश रावत को बेदखल किया था, लेकिन भाजपा खुद हाशिए पर चली गई।
राजनीतिक रूप से आगे बढ़ने के लिए अब भाजपा को केवल सुप्रीम कोर्ट का ही सहारा है। यदि वहां भी मनमुताबिक फैसला नहीं आया तो भाजपा को लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार को गिराने के कलंक के साथ ही चुनावी रण में जाना होगा।
एक महीने का यह घटनाक्रम खुद में कई राजनीतिक नजीरें समेटे हैं। भविष्य में भाजपा शायद यह सबक जरूर लेगी कि बेवक्त शुरू की गई लड़ाई में जीत की संभावना कम ही होती है। एक महीने की राजनीतिक उठापटक की यात्रा में कोई अकेला चला तो किसी के साथ कारवां रहा। भाजपा और कांग्रेस में भी एक बड़ा फर्क दिखा।
स्टिंग आपरेशन जैसी तोहमत झेलने के बावजूद पूरी कांग्रेस हरीश रावत के पीछे लामबंद रही। और, भाजपा में इस जंग के सेनापति भगत सिंह कोश्यारी से पार्टी के बड़े क्षत्रपों ने दूरी बना ली। जहां कांग्रेस एकजुट हुई वहीं भाजपा के अंदर विघटन साफ तौर पर दिखा। इसकी वजह थी कि केंद्रीय नेतृत्व ने भगतदा को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय ले लिया था।