उत्तराखंड के चंपावत में मां बाराहीधाम देवीधुरा में 21 अगस्त को होने वाले पाषाण युद्ध के लिए चार खामों की सेनाएं तैयार होने लगी हैं।
इसके साथ ही यहां का ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान एक बार फिर से बग्वाल युद्ध के लिए सजने लगा है। इस मैदान में रक्षाबंधन के दिन यानि 21 अगस्त को पत्थर मार युद्ध की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा एक बार फिर से जीवंत रूप लेगी।
देश विदेश में प्रसिद्ध देवीधुरा की बग्वाल यहां केलोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप होने के साथ ही सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करने की विषय वस्तु भी है।
एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां की चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में किस प्रकार खून बहाते हैं, यह सामाजिक सद्भाव के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है।
क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया खाम केलोग श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना कर एक-दूसरे को बग्वाल का निमंत्रण देते हैं।
माना जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि दिए जाने की रीति थी, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई तो वंशनाश के डर से उसने मां वाराही की तपस्या की।
माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तब से ही बग्वाल का सिलसिला चला आ रहा है।
बग्वाल के लिए करनी पड़ती हैं खास तैयारियां
बग्वाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को विशेष तैयारियां करनी होती हैं। खान पान की शुद्धता के साथ बग्वाल स्वच्छ कपड़े पहनकर लाठी और रिंगाल की बनी ढाल के फर्रे से खेली जाती है।
सुरक्षा के लिए मैदान में फर्रो और लाठियों को सटाकर कवच बनाया जाता है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल द्वारा फेंके गए पत्थर को दोबारा से दूसरी तरफ फेंकना ही बग्वाल कहलाता है।
प्रतिवर्ष लगता है देश-विदेश के लोगों का तांता
अतीत से ही अषाड़ी कौतिक के नाम से मशहूर देवीधुरा की बग्वाल को देखने प्रतिवर्ष देश-विदेश के हजारों पर्यटक और श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। मेला अवधि में क्षेत्र की लोक कलाओं के प्रदर्शन केअलावा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी चरम पर रहता है।