पहाड़ की महिलाओं का जीवन आज भी पहाड़ के समान है। खेतीबाड़ी, पशुपालन, घर का कार्य सबमें महिलाओं की भागीदारी मुख्य रहती है। असोज के महीने में काम की अधिकता के कारण महिलाएं अपने खानपान और सेहत पर ध्यान तक नहीं दे पाती हैं। गर्भवती महिलाओं को भी क्षमता से अधिक काम करना पड़ता है। सेहत के प्रति यही लापरवाही इन दिनों महिलाओं में गर्भपात की समस्या को बढ़ा रहा है। हालात यह हैं एक महीने के अंतराल में रोजाना एक गर्भवती गर्भपात का शिकार हुई है।
ग्रामीण महिलाओं में कार्य के भार का असर गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ रहा है। खानपान और स्वास्थ्य में अनदेखी के कारण महिलाओं में गर्भपात की दर बढ़ा रही है। जिला अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार सितंबर में कुल 40 महिलाओं का गर्भपात हुआ जिसमें से चार महिलाओं ने अपना पहला बच्चा खोया है। 30 गर्भवतियों का छह से आठ हफ्ते की समयावधि में गर्भपात हुआ, जिनमें 40-60 फीसदी महिलाएं ऐसी थीं जिनके पहले से ही बच्चे थे। चार महिलाओं का आठ से दस हफ्ते में, एक महिला का दस से बारह हफ्ते में, एक महिला का 12-16 हफ्ते में, दो महिलाओं का 16-20 हफ्ते में और दो महिलाओं का 20 हफ्ते के दौरान गर्भपात हुआ है। वहीं, अक्तूबर में अब तक तीन महिलाओं का गर्भपात हो चुका है जिसमें दो महिलाओं ने अपने पहले गर्भ को खोया है।
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जिला अस्पताल में सितंबर और अक्तूबर में गर्भपात का आंकड़ा बढ़ जाता है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को आराम की जरूरत होती है। क्षमता से अधिक कार्य करने और समय से खाना न खाने, पानी न पीने के कारण गर्भपात की आशंका बढ़ सकती है। अस्पताल आने वाली प्रत्येक महिला को समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराने की सलाह दी जाती है।
- डॉ. रीमा उपाध्याय, महिला रोग एवं प्रसूता विशेषज्ञ, जिला अस्पताल बागेश्वर।