आयुष मंत्रालय और वन विभाग में तालमेल की कमी के कारण कुमाऊं का एकमात्र कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र वन विभाग को हस्तांतरित नहीं हो सका है। जिस कारण इस केंद्र में पल रहे मृगों से पिछले पांच साल से कस्तूरी नहीं निकाली जा सकी है।
इसके चलते संपत्ति का सदुपयोग नहीं हो सका है और विभाग को भी हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार की ओर से वर्ष 1974 में धरमघर के महरूड़ी नामक स्थान पर कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई।
40 नाली भूमि में बने इस केंद्र में 17 कस्तूरा मृग पल रहे हैं। इस केंद्र का उद्देश्य कस्तूरा मृगों से मस्क निकालकर आयुर्वेदिक, यूनानी दवा बनाने के लिए केंद्रीय शोध संस्थानों को उपलब्ध कराना था। इस केंद्र से निकाली गई मस्क को भेषज विज्ञान के पटियाला, कोलकाता, ग्वालियर, केरल स्थित रिसर्च सेंटर्स में भेजा जाता था।
बेहद गर्म होने वाले कस्तूरा से पुंसत्व बढ़ाने और कार्डियो से संबंधित दवाएं बनाई जाती हैं। कस्तूरा मृगों में जुलाई-अगस्त में कस्तूरी तैयार हो जाती है। सितंबर, अक्टूबर में इसे नर कस्तूरा की नाभि से निकाली जा सकती है। यह प्रक्रिया फॉरेस्ट, वेटेरिनरी कंसलटेंट सहित चार सदस्यीय टीम की निगरानी में होती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक ग्राम कस्तूरा की कीमत करीब 1400 डॉलर बताई जाती है। इसके बावजूद वर्ष 2004 में आयुष मंत्रालय ने इस केंद्र को बंद कर वन विभाग को सौंपने के निर्देश दे दिए थे। इसके लिए कागजी कार्रवाई चली लेकिन दोनों विभागों की ओर से खास दिलचस्पी न दिखाने से यह केंद्र हैंडओवर नहीं हो सका है।
सरकार ने पहले इस कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र को बागेश्वर वन प्रभाग को सौंपने की तैयारी की थी, लेकिन बाद में नैनीताल जू को टेकओवर करने के निर्देश दिए गए, जिस पर अमल नहीं हो सका है। इसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2010 से केंद्र में संरक्षित कस्तूरा मृगों से मस्क नहीं निकाली जा सकी है।
ऐसे में पिछले पांच साल में करोड़ों रुपये का नुकसान हो चुका है। वहीं नैनीताल चिड़ियाघर प्रभारी मनोज साह ने बताया कि जू में एक भी कस्तूरा मृग नहीं है। इसलिए महरूड़ी से एक जोड़ा कस्तूरा मृग मंगाने का प्रयास करने पर पूरे केंद्र को टेकओवर करने का सुझाव मिला। इस बारे में निदेशालय स्तर पर कार्रवाई चल रही है।
कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र, महरूड़ी के प्रभारी डॉ. ललित मोहन सिंह नयाल के मुताबिक इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य मस्क का उत्पादन करना था। इस अनुसंधान केंद्र में 17 कस्तूरा मृग हैं। जिनमें आठ नर, नौ मादा कस्तूरा मृग हैं। संस्थान में 11 कर्मचारी कार्यरत हैं।
मस्क सिर्फ नर कस्तूरा में पाई जाती है। निकाली गई मस्क को रिसर्च सेंटर को भेज दिया जाता है। एक नर कस्तूरा से अधिकतम 22 ग्राम कस्तूरा निकलती है लेकिन अनुमति न मिलने के कारण वर्ष 2010 से कस्तूरा मृगों से मस्क नहीं निकाली जा सकी है।