सर्दियों में बारिश के कम होने का असर आम पर दिख रहा है। इस सीजन में आम में बौर कम आने से करीब 30 से 40 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। वैज्ञानिक कम बौर आने को चिंता का विषय मान रहे हैं।
जिलेे में आम की पैदावार 558.29 हेक्टेयर क्षेत्रफल में होती है। जिले में मुख्यत: पांच प्रकार के आम बंबइया ग्रीन, आम्रपाली, चौसा, दशहरी और अचारी आम का उत्पादन होता है। आम से अचार,जूस, मैंगो शेक, मुरब्बा, चटनी, पापड़, अमचूर, सॉस आदि उत्पाद बनाए जाते हैं। पिछलेे वर्ष जिले में 2499.20 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ था। इस साल आम के अधिकांश पेड़ों में बौर नहीं दिख रहा है। बौर को कीट भी नुकसान पहुंचाते हैं। जिसके कारण फल बनने तक आधा बौर गिर जाता है। ऐसे में कम बौर को सुरक्षित रखकर ही फल उत्पादक आम की पैदावार को बचा सकते हैं।
आम का बौर निकलने में अभी सात से दस दिन का समय बाकी है। पेड़ में बीते वर्ष अधिक मात्र में आम की पैदावार होने से आगे के वर्षों में बौर कम आना शुरू हो जाता है। पेड़ की जेनेटिक व्यवस्था के कारण किसी साल अच्छा और किसी साल कम बौर आता है। आठ से नौ माह पुरानी डाली में अच्छा बौर आता है। धीरे-धीरे आम के पेड़ में बौर आना कम हो जाता है। बौर कम आना चिंताजनक है लेकिन इस पर मौसम का असर हुआ है यह कहना जल्दबाजी होगी।
- डॉ. कमल पांडेय, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र काफलीगैर
Iअसमय बारिश का फसल पर असर पड़ा है। अक्सर आम की फसल तीसरे साल अच्छी होती है। बौर आने के बाद भी अनुकूल तापमान न होने से कई पेड़ो में फफूंद लग जाती है। बौर को बचाने के लिए कीटनाशक और फफूंदनाशक स्प्रे का छिड़काव किया जा रह है। काश्तकार बौर में कीट संबंधी दिक्कतों का सामना कर रहें है तो वे उद्यान विभाग से संपर्क कर सकते है। बौर बचाने के लिए हरसंभव मार्गदर्शन दिया जाएगा।
- आर के सिंह जिला उद्यान अधिकारी बागेश्वर I