बागेश्वर। विकास की आस में बच्चे जवान हो गए लेकिन जिले में मूलभूत समस्याओं की कमी कई इलाकों में जस की तस है। वर्ष 1997 में पृथक जिला बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब विकास कार्यों में तेजी आएगी पर ऐसा हुआ नहीं। जिले के कई गांव ऐसे हैं जहां आज भी मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाने के लिए डोली ही सहारा है।
वर्ष 2015 में जैसर और गढ़खेत गांव को जोड़ने के लिए ढुकुरा-सेलकुना-गढ़खेत मोटर मार्ग का सर्वे हुआ था लेकिन छह साल बाद भी गांव मोटर मार्ग से नहीं जुड़ सका है। मोटर मार्ग न होने से दोनों ग्राम पंचायतों की करीब 1500 की आबादी प्रभावित है। ग्रामीणों को जरूरी सामान के लाने के लिए रोजाना आठ से 10 किमी की पैदल दौड़ लगानी पड़ती है। गांवों में अधिकतर संख्या महिलाओं और बुजुर्गों की है, जिनके लिए रोजमर्रा का सामान लाना भी परेशानी का सबब है। ग्रामीणों को सबसे अधिक परेशानी तब होती है जब गांव में कोई बीमार हो जाता है या गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू होती है। पैदल उबड़-खाबड़ रास्ते पर डोली में बैठाकर मरीज को लाने में दिक्कत आती है। कई बार गांव में युवाओं के न होने से अन्य गांवों से लोगों को मदद के लिए बुलाना पड़ता है।
वोट नहीं देने का बनाया है मन
बागेश्वर। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले छह वर्ष से कई बार डीएम, विधायक को ज्ञापन दिया गया, लेकिन सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं होती। बार-बार गुहार लगाकर थक चुके ग्रामीणों ने आगामी विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करने की चेतावनी दी है। संवाद
गांव पहुंचने पर महंगा हो जाता है राशन
बागेश्वर। गांव तक खाद्य सामग्री और अन्य सामान खच्चरों की मदद से लाना पड़ता है। इसके लिए लोगों को प्रति चक्कर 250 से 350 रुपये तक भाड़ा चुकाना पड़ता है। ग्रामीणों को रसोई गैस का एक सिलिंडर गांव तक लाने में 1200 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। संवाद
चार कोट, तीन सचित्र और एक सादा
देश की आजादी के 74 और जिले की स्थापना के 24 वर्ष बीतने के बावजूद गांव का मोटर मार्ग से नहीं जुड़ना विकास के दावों की पोल खोलता है। तहसील मुख्यालय से मात्र 15 किमी की दूरी पर बसे गांवों को सड़क से नहीं जोड़ा गया है। अब चुनाव बहिष्कार ही एकमात्र विकल्प है।
अमर सिंह लार्ड, ग्रामीण गढ़खेत।