मंदिरों की नगरी के नाम से मशहूर द्वाराहाट से 10 किमी दूर स्थित उत्तराखंड की काशी नाम से विख्यात प्राचीन विमांडेश्वर महादेव मंदिर उपेक्षा का दंश झेल रहा है। इस मंदिर में लोगों की अपार आस्था है लेकिन रखरखाव के अभाव में अब यह मंदिर जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है। क्षेत्र के लोग मंदिर को मानस माला खंड में शामिल कर इसके कायाकल्प करने की मांग कर रहे हैं।
पुराना है इतिहास
रिस्कन नदी घाटी के इस स्थल को मुक्तिधाम भी कहते हैं, जहां हर साल हजारों साधु और लोग ध्यान और दर्शन के लिए पहुंचते थे। यहीं पर नंदिनी और सुरभि नदियों का संगम होता है। इसमें स्नान करने के साथ ही पितरों का तर्पण करने की भी मान्यता है। इस तीर्थ की मान्यता हरिद्वार के बराबर बताई गई है।
मंदिर में अलग-अलग कलाकृतियों की मूर्तियां
इस मंदिर में काल भैरव, भगवान शिव, भगवान गणेश, सीता, राम आदि देवों की मूर्तियां हैं। मंदिर के बाहर से कपिला गौमाता का शिलापट आकर्षण का केंद्र है। इस मंदिर में चार वेदों का यज्ञ भी जनकल्याण के लिए किया गया था।
पुस्तकालय भी बन गया इतिहास
क्या कहते हैं लोग
उत्तराखंड की काशी नाम से विख्यात विमांडेश्वर शिव मंदिर श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। यहां पितरों का तर्पण भी किया जाता है। लेकिन अब धीरे -धीरे ये धरोहर विलुप्त होने के कगार पर है।-दीवान सिंह मेहता, सामाजिक कार्यकर्ता।
विमांडेश्वर महादेव मंदिर लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। लेकिन मंदिर जीर्णशीर्ण होने से धामिक कार्यों में मुश्किल होती है। इसका जीर्णोद्धार किया जाना बेहद जरूरी है।
-पंडित गोपाल दत्त जोशी, पुजारी विमांडेश्वर महादेव, द्वाराहाट।
मंदिर समिति के आवेदन के बाद विभाग की ओर से स्थलीय निरीक्षण किया जायेगा। इसके बाद ही आगे कि कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ.चंद्र सिंह चौहान, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, अल्मोड़ा।
मंदिर तक ऐसे पहुंचे
इस पौराणिक मंदिर तक पहुंच भी आसान है। अल्मोड़ा से होते हुए दौलाघट कुंवाली होते हुए द्वाराहाट पहुंचा जा सकता है। यहां से दस किलोमीटर दूर मंदिर है जहां तक पक्की सड़क है। निजी वाहनों के साथ ही प्राइवेट टैक्सियों से भी पहुंचा जा सकता है। पहले यहां रोडवेज की बसें भी चलती थी केमू की बस अभी भी जाती है। यहां तक पहुंचने के लिए रानीखेत और रामनगर क्षेत्र से भी रास्ते हैं।