अंग्रेजों के शासनकाल में 1915 में देघाट के निकट तालेश्वर मंदिर परिसर में छठी शताब्दी के दो दुर्लभ ताम्रपत्र मिले थे। यह दोनों दुर्लभ ताम्रपत्र आजादी से पहले से ही लखनऊ संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं, जबकि अल्मोड़ा संग्रहालय में इनकी रिप्लिकाएं हैं। उत्तराखंड बन जाने के बाद भी इन एतिहासिक ताम्रपत्रों को अल्मोड़ा संग्रहालय लाने का प्रयास नहीं हुआ है। यह ताम्रपत्र द्विज बर्मन और द्विति बर्मन के शासनकाल के हैं। ब्राह्मी लिपि में लिखे गए इन ताम्रपत्रों का हिंदी में अनुवाद भी हो चुका है।
अल्मोड़ा और आसपास के इलाके ऐतिहासिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहे हैं। अल्मोड़ा करीब साढ़े तीन सौ साल तक चंद शासकों की राजधानी रही। अल्मोड़ा से लगी कत्यूर घाटी से कत्यूरी राजाओं का इतिहास जुड़ा रहा है। कुमाऊं में जागेश्वर, बैजनाथ, कटारमल, द्वाराहाट समेत सभी महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर और शिल्प कत्यूरी काल का ही माना जाता है। कत्यूरी शासन का काल सातवीं से 14वीं शताब्दी तक का माना जाता है, जबकि उससे पहले कुमाऊं अंचल में शासन की क्या व्यवस्था थी इसका कोई इतिहास मौजूद नहीं है, लेकिन समय-समय पर मिले दुर्लभ दस्तावेजों और ताम्रपत्रों से पता चलता है कि इससे पहले भी कुमाऊं में अलग-अलग वंशजों का शासन रहा।
अंग्रेजों के शासनकाल में 1915 में देघाट के निकट तालेश्वर मंदिर परिसर में छठी शताब्दी के दो दुर्लभ ताम्रपत्र मिले थे। तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर ने इन ताम्रपत्रों को लखनऊ में स्थित राज्य संग्रहालय में भेज दिया था। यह दोनों ताम्रपत्र ब्रह्म लिपि में लिखे गए हैं। बाद में इनका हिंदी में अनुवाद भी कर दिया गया था। जिससे यह पता लगा कि दोनों ताम्रपत्र छठी शताब्दी के हैं। यह ताम्र पत्र उस दौर में शासन करने वाले पौरव वंशी और द्विज बर्मन और द्विति बर्मन के शासन काल के हैं। इनमें स्थानीय कई गांवों का भी उल्लेख होना बताया गया है। उत्तराखंड के इतिहास से जुड़े यह महत्वपूर्ण ताम्रपत्र आज भी लखनऊ संग्रहालय में ही हैं। लोगों का मानना है कि अब मूल ताम्र पत्र अल्मोड़ा संग्रहालय में लाए जाने चाहिए और इनकी रिप्लिकाएं लखनऊ संग्रहालय में रखी जाएं, लेकिन अलग राज्य बनने के बाद भी इन दुर्लभ ताम्रपत्रों को लखनऊ से उत्तराखंड वापस लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। यहां तक कि उत्तर प्रदेश के संबंधित विभाग को एक पत्र तक नहीं लिखा गया है। इस बारे में जब राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा के प्रभारी ज्ञान प्रकाश तिवारी को याद दिलाया गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि यह दोनों ताम्रपत्र अब लखनऊ अल्मोड़ा संग्रहालय लाए जाने चाहिए। तिवारी ने बताया कि वह शीघ्र ही इसके लिए संस्कृति विभाग के निदेशक के माध्यम से उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के निदेशक को पत्र भेजेंगे।