जैंती के धामद्यो में स्थापित शहीद स्तंभ।
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जैंती (अल्मोड़ा)। देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने में सालम के जिन वीर सपूतों ने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए उन शहीदों के गांव आजादी के 73 साल बाद भी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। शहीद नर सिंह धानक का पैतृक गांव चौकुना और टीका सिंह कन्याल का गांव कांडे में सुविधाओं का अभाव है। मालूम हो कि 25 अगस्त 1942 को सालम के धामद्यो में अंग्रेजी सेना और क्रांतिकारियों के बीच हुए युद्ध में नर सिंह धानक और टीका सिंह कन्याल शहीद हो गए थे।
स्वास्थ्य सुविधा का लाभ उठाने के लिए चौकुना के लोगों को 15 किमी और कांडे के लोगों को छह किमी दूर जैंती स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ता है। कई बार गंभीर रोगी रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। कांडे गांव में तो प्राथमिक स्कूल तक नहीं हैं। यहां के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के लिए छह किमी दूर जैंती की दौड़ लगानी पड़ती है। आजादी के कई दशक बाद भी शहीदों के पैतृक गांवों में उनकी प्रतिमा तक नहीं लग सकी हैं। चौकुना के उप प्रधान राजेंद्र सिंह धानक ‘राजू’ का कहना है कि गांव तमाम समस्याओं से जूझ रहा है। वहीं कांडे गांव के राम सिंह कन्याल का कहना है कि पगडंडियों का सहारा ही इस गांव की पहचान बन कर रह गई है।