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‘छाना बिलोरी झन दिया बौज्यू लागनी बिलोरी का घामा’

Sat, 31 Jan 2015 11:54 PM IST
आनंद नेगी/अमर उजाला, बागेश्वर।
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छाना बिलोरी झन दिया बौज्यू लागनी बिलोरी का घामा। इस बेहद लोकप्रिय पहाड़ी लोकगीत को सुनकर छाना बिलोरी के बारे में जानने की आपकी उत्सुकता जगी होगी। ये गीत क्यों बना, कैसे इसका विचार आया, क्योंकि कोई भी गीत यूं ही नहीं बन जाता, उत्पन्न होता है।  आखिर छाना बिलोरी में ही धूप क्यों लगती है।
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इसका राज जानने के लिए हमारे रिपोर्टर ने छाना बिलोरी पहुंच, लोगों से बातचीत की तो पता चला उनके गांव में बीमार करने वाला घाम तो नहीं लगता है मगर इससे उनके गांव की पहचान जरूर जुड़ गयी है और वह भी एक सास बहू की खींचतान के कारण। गर्मियों में गांव का अधिकतम तापमान 35 डिग्री रहता है। हालांकि इस गांव में सूर्य की सीधी किरणें तो पड़ती हैं फिर भी बागेश्वर घाटी की जैसी गर्मी यहां नहीं होती है। बावजूद इसके  लोग इस गांव में बेटी का रिश्ता करने से पहले सुविधाओं के बारे नहीं धूप के बारे में जरूर पूछते हैं।

गांव में धूप लगने से संबंधित यह गीत किसने बनाया ग्रामीणों को यह तो जानकारी नहीं है। बुजुर्ग भी बताते हैं, वे भी बचपन से इस गीत को सुनते आ रहे हैं। हां उन्हें इतना जरूर याद है कि गायक, बांसुरी वादक प्रताप सिंह और मोहन सिंह रीठागाड़ी के इस गीत को गाने के बाद यह लोकप्रिय हो गया।  83 वर्षीय हयात सिंह रौतेला और 81 वर्षीय रतन सिंह रौतेला बताते हैं कि तकरीबन 75 साल पहले कांडा के ठंडे इलाके से एक लड़की की शादी बिलोरी में हुई। कांडा से यहां का मौसम कुछ गर्म तो जरूर है। फिर बताते हैं, उसकी सास से नहीं पटी।
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तनातनी की गर्मी सिर चढ़ गयी, बहाना पक्का हो गया और वह मायके  गई। विवाहिता ने मायके में बताया कि छाना बिलोरी में बीमार करने वाली धूप पड़ती है, इसलिए वह ससुराल नहीं जाएगी। इसके बाद वह ससुराल नहीं आई। गांव के बाहर के किसी व्यक्ति ने महिला के पलायन को गीत का रूप दे दिया। इस गीत से छाना बिलोरी गांव की पहचान घाम के साथ जुड़ गई।

छाना बिलोरी गांव बागेश्वर ब्लाक के अल्मोड़ा-बागेश्वर मार्ग पर झिरोली मैग्नेसाइट से एक किमी दूरी पर स्थित है। सात सौ परिवार वाले इस गांव की आबादी ढाई हजार के करीब है। गांव में सड़क, बिजली और पानी की सुविधा है। आठवीं तक स्कूल भी आंगन में है और डेढ़ किमी पर इंटर कालेज। पास में काफलीगैर बाजार है, यहीं सरकारी अस्पताल और झिरोली मैग्नेसाइट फैक्ट्री भी है। इस फैक्ट्री से गांव के लगभग 80 लोगों को रोजगार भी मिला है। यहां पहाड़ के अन्य गांवों का जैसा पलायन भी नहीं है। सिंचाईं के लिए नहर होने से खेती भी अच्छी होती है। सुविधाओं के बावजूद लोग छाना बिलोरी में

कुमाऊं रेजीमेंट की धुन में शामिल
 छाना बिलोरी से संबंधित इस गीत को कुमाऊं रेजीमेंट ने अपने बैंड की धुन में भी शामिल किया है। रेजीमेंट के मुख्य समारोहों में इस धुन के साथ शानदार बैंड डिसप्ले देखा जा सकता है।

छाना बिलौरी पर गीत
छाना बिलोरी झन दिया बौज्यू लागनी बिलोरी का घामा।
हाथै कि कुटली हाथै में रौली लागनी बिलोरी का घामा।
बिलोरी का धारा रौतेला रौनी लागनी बिलोरी का घामा।
अर्थात पिताजी छाना बिलौरी गांव में मेरी शादी मत करना, वहां की धूप बीमार कर देती है। वहां हाथ की कुदाल हाथ में ही रह जाएगी। बिलोरी की धार में रौतेला लोग रहते हैं।
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सात सौ परिवारों का गांव
बागेश्वर। छाना,  बिलोरी,कराला, मटेला सहित सभी तोकों की आबादी  ढाई हजार के आसपास है,  जहां लगभग साढे़ सात सौ परिवार रहते हैं। बिलौरी का  गांव घाटी के मध्य उभरे एक टीले पर बसा है। अधिसंख्य आबादी रौतेला लोगों की और शेष परिवार अनुसूचित जाति के हैं।
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