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अल्मोड़ा को हमेशा याद आएगा बिरजू के घुंघुरुओं की छन-छन के साथ गजब का कथक

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कथक सम्राट और गुरु पंडित बिरजू महाराज के साथ अल्मोड़ा के पंकज रावत। - फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कथक नृत्य की धड़कन कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज का सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा से भी नाता रहा है। बिरजू मराहाज 1970 दशक के मध्य में अल्मोड़ा में आयोजित ग्रीष्मोत्सव में आए थे। उन्होंने मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। घुंघरुओं की छन-छन के साथ उनका शानदार कथक नृत्य अल्मोड़ा वासियों को अब भी याद है और आगे भी हमेशा याद रहेगा। तब उनके कार्यक्रम को देखने भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा था। दूर गांवों से भी लोग पहुंचे थे। उन्होंने अल्मोड़ा की संस्कृति और यहां की सांस्कृतिक विविधता की सराहना की थी।
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पालिकाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जोशी के मुताबिक भारतीय नृत्य कला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाने वाले कथक सम्राट बिरजू महाराज 1970 दशक के मध्य में अल्मोड़ा आए थे। उन दिनों अल्मोड़ा के जीआईसी मैदान में ग्रीष्मोत्सव आयोजित होते थे। बिरजू महाराज ने भी ग्रीष्मोत्सव में शानदार प्रस्तुति दी थी। भारी संख्या में पहुंचे लोगों को जहां जगह मिली वहीं बैठकर एकटक होकर बिरजू महाराज के कार्यक्रम को देखा। बिरजू के घुंघरुओं की छन-छन के साथ कथक नृत्य का गजब तालमेल देखकर दर्शक भाव विभोर हो गए थे। दर्शक दीर्घा से बिरजू-बिरजू की आवाज भी गूंजी थी। लोगों के आग्रह पर बिरजू महाराज ने मंच पर देर तक प्रस्तुति दी थी। बिरजू महाराज के यूं चले जाने की खबर मिलने से संगीत और कथक प्रेमियों में शोक छा गया है। संवाद
बाल मिठाई ले गए थे बिरजू महाराज
अल्मोड़ा। लोग बताते हैं कि बिरजू महाराज को यहां की बाल मिठाई काफी पसंद आई थी। वह सौगात के रूप में यहां से बाल मिठाई भी अपने साथ ले गए थे। बिरजू महाराज को जब भी अल्मोड़ा के लोग मिलते थे वह बड़ी आत्मीयता से उनसे मिलते थे। संवाद
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कथक के गुर बताने के साथ ही संस्कार भी देते थे बिरजू
अल्मोड़ा। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के निकट रहने वाले पंकज रावत बिरजू महाराज के शागिर्द रहे हैं। पंकज ने बिरजू महाराज से कथक की बारीकियां सीखीं। संवाद न्यूज एजेंसी से विशेष बातचीत में पंकज ने कहा कि बिरजू महाराज अद्भुत गुरु थे। वह शिष्यों को कामयाबी की मंजिल तक पहुंचाने के लिए पूरी ताकत झोंक देते थे। पंकज ने वर्ष 2014 से 2016 तक तीन साल बिरजू महाराज से कथक का प्रशिक्षण लिया। पंकज ने बताया कि बिरजू महाराज से
तीन सालों में बहुत कुछ सीखने को मिला। वह कथक की बारीकियां तो बताते ही थे इसके साथ ही संस्कार भी देते थे। वह शिष्यों के साथ शालीन व्यवहार करते थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह शिष्यों के साथ बच्चों जैसा ही व्यवहार करते थे। शिष्यों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं करते थे। पुरातन लोक संस्कृति से भी शिष्यों को अवगत कराते थे। पंकज कथक नृत्य में शोध कर रहे हैं। पंकज को कथक में बेहतरीन कार्य के लिए राष्ट्रीय छात्रवृति भी मिली है। पंकज ने कहा कि अब उनसे जुड़ी यादें ही शेष रह गई हैं।
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