होलिका दहन में पूर्णिमा और प्रदोषकाल का विशेष महत्व माना जाता है। इस बार 23 मार्च को दोनों का मिलन नहीं हो पा रहा है। इसके बावजूद पंडितों के अनुसार 23 मार्च को सिंह लग्न में शाम 4.55 से 5.30 बजे के बीच होलिका दहन कर लिया जाए। इसके बाद रात में 1.30 से 3 बजे के बीच धनु लग्न में होलिका दहन का योग है।
प्रदोष व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भद्रा रहित काल में होलिका दहन किया जाता है। यदि पूर्णिमा तिथि दो दिन हो तो दूसरे दिन होलिका दहन करना चाहिए। फाल्गुन पूर्णिमा 22 और 23 मार्च दो दिन व्याप्त हो रही है।
पूर्णिमा की शुरुआत 22 मार्च को दोपहर 3.10 बजे होगी, जो कि 23 मार्च को शाम 5.30 बजे तक रहेगी। 22 मार्च को दोपहर 3.10 बजे से ही भद्रा शुरू होगी। भद्रा 23 मार्च को प्रात: 4.26 बजे तक रहेगी।
भद्राकाल में शुभ कार्य वर्जित:
भद्राकाल में शुभ कार्य वर्जित होते हैं। 23 मार्च को प्रदोष काल शाम 6.28 बजे से शुरू होगा, जो कि रात्रि 7.28 बजे तक रहेगा। इससे पूर्व पूर्णिमा तिथि समाप्त हो रही है।
जब पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल में भी रहती है, उसी समय होलिका दहन किया जाता है, हालांकि इस बार ऐसा नहीं हो पा रहा है। ऐसे में होलिका दहन 23 मार्च को शाम 4.55 से शाम 5.30 बजे के मध्य करना शुभ माना जा रहा है। इस समय होलिका दहन न कर पाने वाले रात्रि 1.30 से 3 बजे के मध्य धनु लग्न में होलिका दहन किया जा सकता है।
होलिका पूजन का शुभ समय:
उत्तराखंड विद्वत सभा के उपाध्यक्ष आचार्य भरत राम तिवारी के अनुसार 23 मार्च को दिन में 12 से 1.30 बजे तक राहु काल में रोग की चौघड़िया होने से यह समय शुभ है। इस डेढ़ घंटे में पूजन होलिका का पूजन करना शुभ रहेगा।
डॉ. आचार्य सुशांत राज के अनुसार प्रात: 6 से 9 बजे तक एवं साढ़े दस से बारह बजे तक पूजन करना शुभ रहेगा। होलिका दहन 23 मार्च को पूर्णिमा रहने तक कर लिया जाए। पंडित ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार होलिका पूजन शाम 3 से 6 बजे तक लाभ की चौघड़िया में शुभ रहेगा। होलिका दहन करना 23 मार्च को ही शुभ रहेगा।