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‘मैं ही हिम्मत हार जाऊंगी तो उसे जेल कैसे भिजवाऊंगी...’

Thu, 17 Jan 2013 01:10 PM IST
लखनऊ/अभिषेक यादव
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‘मैं ही हिम्मत हार जाऊंगी तो उसे जेल कैसे भिजवाऊंगी...’ यकीन ही नहीं होता कि साधारण सी दिखने वाली एक लड़की इंसाफ की लड़ाई के लिए अपने भीतर इतनी ताकत सहेजे है। लेकिन जल्द ही समझ में आ जाता है कि साढ़े 7 साल में दर्जनों वकीलों, जजों, पुलिसकर्मियों, चिकित्सकों, महिला संगठनों, अपनों-परायों लगभग हर पक्ष से बात करते-सुनते उसने यह ताकत और सलीका जुटाया है।
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आशियाना गैंगरेप पीड़ित आयशा (परिवर्तित नाम) अपनी बात रख रही होती है तो उम्मीद करती है कि उसे सुना जाए। उससे बात करते हुए महसूस किया जा सकता है कि अपमान, अत्याचार और इंसाफ की जंग की गहरी पीड़ा से गुजरते हुए उसने जिंदगी के अनगिनत रंग कितने करीब से देख लिए हैं। इस बीच उसने कुछ सपने और लक्ष्य तय किए हैं, जिन्हें पाने के लिए पूरे जज्बे के साथ तैयारी कर है। वह बहुत दृढ़ता से कहती है कि उस पर हुए जुल्मों का हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ है, जब ‘पूरा इंसाफ’ होगा तब शायद लड़कियों पर दरिंदगी करने वालों को सबक मिलेगा कि वे बच नहीं सकते।

इस कांड के मुख्य आरोपी गौरव शुक्ला को किशोर न्याय बोर्ड की ओर से बालिग घोषित किए जाने के बाद ‘अमर उजाला’ ने आयशा से इंसाफ के लिए उसकी लड़ाई और जज्बे को जानने की कोशिश की। बातचीत से पहले आयशा के पिता और दूसरे साथियों ने स्पष्ट किया था, ‘कृपया जो बीता, उस पर बात न कीजिएगा, आगे की बात पूछिए।’ संवाददाता ने इस पर विशेष ध्यान दिया। हालांकि खुद आयशा ने इस सीमा को नकार दिया और बताया कि इस त्रासदी और न्यायिक कार्रवाई झेलने के बाद उनमें जो हिम्मत है, वो उसे ताउम्र बुराइयों के खिलाफ लड़ने और सच की आवाज बुलंद करने की प्रेरणा देगी।  
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:- अपने पर जुल्म करने वालों से कैसा सुलूक चाहती हैं?

(विधानसभा के सामने एडवा कार्यालय में एक तख्त पर बैठी आयशा विधानसभा की ओर देखते हुए कुछ देर सोचती है। करीब 30 सेकंड गुमसुम रहने के बाद कहती है) मुझे नहीं पता कि आगे क्या होगा। हम चाहते हैं कि जिन्होंने मेरे साथ वो सब किया, उन्हें सबसे कड़ी सजा मिले। मैंने हाल में पढ़ा कि मेरे जैसा ही एक मामला दिल्ली में हुआ है। सिर्फ वहीं नहीं हमारे अपने प्रदेश और लखनऊ में भी लगातार लड़कियों को नोंचा-फेंका जा रहा है। कड़ी सजा ही ऐसी घटनाओं पर रोक लगा सकती है। लेकिन बहुत कम मामले सामने आते हैं, जहां जुल्म की शिकार लड़की अत्याचारियों को जेल में सड़ने के लिए जाते देख पाती है। हमें सोचने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हो रहा है? अगर लोगों को मालूम होगा कि जो गलत काम कर रहे हैं, उसके अंजाम से वे बच नहीं सकते तो किसकी हिम्मत है कि लड़की को अगवा करके उसके साथ जुल्म करे?

:- अब तक जिस तरह मामला चला, उससे खुश हैं?

नहीं! (इस बार बिना वक्त लिए तुरंत जवाब मिला)। मैं कतई खुश नहीं हूं। सिर्फ अब जाकर थोड़ी राहत मिली है। वरना पिछले साढ़े 7 साल से लगातार परेशानियां उठानी पड़ी हैं। हम गरीब परिवार से हैं। कोर्ट आने-जाने की बात हो तो मेरे पिता को सोचना पड़ता है कि उस दिन काम नहीं हो सकेगा, पैसों का नुकसान होगा। इतनी तकलीफें नहीं होती अगर हमारी सुनवाई जल्दी होती। बहस और फैसले जल्द से जल्द हों। कुछ परेशानियां और भी कम होतीं अगर मेरे साथ जो हुआ, उसे पहली ही बार में लिखकर रख लिया जाता। जो बीता, बार-बार वही सब बताना। नए-नए लोगों, नई-नई जगहों पर फिर वही बताना बहुत दुखी करता है। सरकार और पुलिस को जुल्मों की शिकार लड़कियों को लेकर नजरिया बदलने की जरूरत है। हम लगातार लड़े, लेकिन इतनी लंबी लड़ाई किसी को भी तोड़ सकती है। सरकार को नियम बनाना होगा कि लड़कियों के मामलों में जल्द न्याय के लिए अलग से सुनवाई हो।

:-लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो?

(सोचते-सोचते बोलने की शैली में मजबूत इरादे जताती है) मुझे पता है कि अभी बहुत लंबी लड़ाई बाकी है, मैं भी इसके लिए तैयार हूं। जब इसकी शुरुआत हुई थी तो मैं हिम्मत हारने लगी थी। लेकिन परिवार ने मदद की और मैंने तय किया मुझे चुप नहीं बैठना है। अगर मैं ही हिम्मत हार जाऊंगी तो गुनहगारों को सजा कैसे दिलवा सकूंगी। वे मुझे हिम्मत हारते देखेंगे तो खुश होंगे, उनकी हिम्मत बढ़ेगी। वे देखेंगे कि मैं कमजोर हो गई हूं तो भारी पड़ने लगेंगे। मैं हर लड़की को आपके जरिए संदेश देना चाहूंगी कि अपने साथ होने वाले किसी जुल्म को मत सहो। आप जितना सहते हैं उतने ही जुल्म बढ़ते जाते हैं। अगर जुल्म के खिलाफ खड़े होंगे तो थोड़ी शुरुआती परेशानी आएगी लेकिन जुल्म भी थमेंगे। दरिंदे खुद को बचाने में लगे जाएंगे, बजाए आप पर जुल्म करने के।

:- कहां से आता है इनता साहस?

(अपने पिता की ओर देखते हुए कहा) मुझे मेरे पिता और परिवार ने साहस दिया। मधु गर्ग मैडम और उनके साथियों ने साहस दिया। मुझे नहीं लगता कि मैंने जो सहा उसके बीच कोई लड़की संघर्ष कर सकती थी। लेकिन जिन्होंने मदद दी, वे ही मुझमें साहस भी भरते रहे। आज इस लड़ाई में बहुत सारे लोग साथ हैं, जिससे साहस बढ़ जाता है।

:- अभी क्या कर रही हैं, भविष्य के लिए क्या सोचा है?

(बातचीत के दौरान पहली बार मुस्कराहट से खिले चेहरे के साथ गर्व से बताया) मैंने घर पर रहकर पढ़ाई की है। एडवा की मैडम ने इसके लिए बहुत कहा, तब मैंने पढ़ाई शुरू की। उन्हें अब लगता है कि मैं 10वीं पास कर सकती हूं और परीक्षा के लिए मेरा नाम लिखाया गया है (आयशा को नेशनल ओपन स्कूल की 10वीं की परीक्षा के लिए रजिस्टर कराया गया है)। अब मुझे समझ आ रहा है कि पढ़ना-लिखना कितना जरूरी है। कोर्ट में अपनी बात रखते हुए पढ़ाई काम आ रही है। अगर पढ़ती नहीं तो पता नहीं जो कहना चाहती हूं वह ठीक से बता भी पाती या नहीं। मेरा सपना है जज बनना। मुझे पता है कि इसके लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ेगी, लेकिन जज बनकर ही मैं जुल्म की शिकार लड़कियों को न केवल न्याय दिलवा सकूंगी, बल्कि जल्द न्याय दिलाने पर जोर दूंगी। साथ ही कुछ पेंटिंग भी करती हूं। यह मुझे अच्छा लगता है।
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