संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने कहा कि श्यामाचरण लाहिड़ी 19वीं शताब्दी के उच्चकोटि के साधक थे। उनकी गीता की आध्यात्मिक व्याख्या आज भी शीर्ष स्थान पर है। वह स्वयं शास्त्र की प्रतिमूर्ति थे और इनकी प्रणाली की यह विशेषता है कि कोई भी गृहस्थ मनुष्य योगाभ्यास द्वारा चिरशांति प्राप्त कर योग के उच्चतम शिखर पर पहुंच सकता है।
वह रविवार को विश्वविद्यालय के योग साधना केंद्र में योगीराज श्यामाचरण मिशन पुणे और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संयुक्त प्रयास से आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। क्रिया योग का वर्तमान सामाजिक एवं दार्शनिक संदर्भ में विमर्श विषयक गोष्ठी को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि जिस प्रकार योग ज्ञान के बिना योगी को नहीं जाना जा सकता उसी भांति योगी को जाने बिना आध्यात्मिक भारत को नहीं जाना जा सकता। इसीलिए कहा जाता है कि योग बिना भारत नहीं और भारत बिना योग नहीं। काशी में योगीराज श्यामाचरण लाहिड़ी पीठ की स्थापना करके शोध कार्य कराया जाए। इस दौरान योगीराज श्यामचरण मिशन के शांतनु कपूर, प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. सुधाकर मिश्र, प्रो. रामपूजन पांडेय, प्रो. महेंद्र पांडेय, प्रो. रमेश प्रसाद, प्रो. अमित कुमार शुक्ल, डॉ. विजय पांडेय, डॉ. दिनेश गर्ग ने विचार व्यक्त किए।