फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

World Sparrow Day: कंक्रीट के जंगलों के बीच घरौंदों में चहचहा रहीं गौरेया, वाराणसी में नन्ही चिड़िया को बचाने को बढ़े कई हाथ

Sun, 20 Mar 2022 11:52 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

विश्व गौरैया दिवस हर साल 20 मार्च को मनाया जाता है। गौरैया के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए साल 2010 में इस दिवस को मनाने की शुरुआत की गई थी।
विज्ञापन
गौरैया - फोटो : social media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सूने घरौंदे करें पुकार, गौरैया आओ यहां ठिकाना बनाओ। आंगन में फुदकने वाली गौरैया से फ्लैट की संस्कृति ने आंगन छीन लिया है। शहर में बड़े बड़े मकान बन गए। कंक्रीट के जंगल की वजह से पेड़ पौधे अब ना के बराबर हैं। विकास की आंधी में पेड़ों की टहनियां टूटती गईं। उदास, निराश गौरैया जाए तो कहां।

विज्ञापन


आशियाने को तरसतीं गौरैया धीरे-धीरे इंसानी आंखों से ओझल होती गई, लेकिन वाराणसी शहर में कुछ ऐसे विश्वकर्मा भी हैं, जिन्होंने गौरैया को बचाने के लिए करोड़ों की कोठियों की शोभा को ताक पर रख दिया। संरक्षण मांगती गौरैया की करुण पुकार इन लोगों को भावुक कर गई। इन्होंने गौरैया को अपने घर में बसाया, सुंदर आशियाना बनवाया। विश्व गौरैया दिवस के मौके पर ऐसे ही लोगों से आपको रूबरू कराती एक रिपोर्ट...

विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत 2010 में हुई थी। कई देशों में इसे अलग-अलग गतिविधियों एवं जागरूकता आयोजनों के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग संरक्षण व विलुप्त होती गौरैया को बचाने के लिए कदम उठाते हैं। नेचर फॉरेवर सोसाइटी इंडिया एवं इको सिस एक्शन फाउंडेशन फ्रांस ने मिलकर इस दिन को शुरू किया है।

विज्ञापन

ममता की छांव में आबाद हो रहे गौरैया के घरौंदे

गौरैया संरक्षण के लिए देश में तरह-तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। महेशपुर की सीमा सिंह ने अपने घर में गौरैया के घरौंदे के लिए कई जतन किए हैं। इनका प्रयास सफल हुआ है और सैकड़ों की संख्या में घर, छत व पौधों पर फुदकती और चहकती गौरैया को देख लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं। इनके घर में सैकड़ों की संख्या में गौरैया को आते-जाते देखा जा सकते है।

डालियों पर इनका चहचहाना सुबह से ही जारी हो जाता है। सीमा कहती हैं बचपन से पर्यावरण को लेकर काफी लगाव था, मायके में पौधे लगाने के साथ चिड़ियों को दाना देना मेरी आदत थी। शादी के बाद ससुराल आई तो सिलसिला जारी रखा। पति भी पशुपालन विभाग में कार्यरत हैं, उन्होंने भी उनके इस सोच का साथ दिया।
गौरैया संरक्षण के लिए सीमा ने अपने घर के चारों ओर पौधे लगाए हैं। पीने के लिए पानी की भी जगह-जगह व्यवस्था की गई है। पौधों पर गौैरैया ने आशियाना बना रखा है। गौरैया के लिए ककूनी और बाजरे की भी व्यवस्था है।

छांव देने की पीढ़ियों से परंपरा

ककरमत्ता स्थित न्यू कॉलोनी निवासी नवनीत पांडेय बताते हैं कि बचपन में जब हम गांव में रहते थे, वहां मां हमेशा गौरैया के लिए खाना और पानी रखती थी। तब से मेरा गौरैया से लगाव है। काम के सिलसिले में शहर आया तो देखा बालकनी में कई गौरैया आती हैं। तब मैंने इनके लिए घरौंदे बनवाए। पहले एक कारीगर से 100 घरौंदे बनवाए।

धीरे-धीरे संख्या बढ़ती गई। बताया कि गौरैया संरक्षण के लिए व्यग्र फाउंडेशन के नाम से शुरू की मेरी मुहिम आज देश ही नहीं विदेशों तक पहुंच गई है। नवनीत बताते हैं कि बुजुर्गों के दौर से गौरैया बचाने की परंपरा है। हमारा बचपन इन घरौंदों में गौरैया को देखकर ही बीता है। अब हमारे बच्चे इन घरौंदे में गौरैया देखते हैं। घर की छत पर जब दिन भर गौरैया आती हैं तो उनकी चहचहाहट सुनकर काफी अच्छा लगता है।
विज्ञापन

गोपाल और उनकी 200 वालंटियर की टोली ने 74 हजार घोंसले लगाए

गौरैया - फोटो : अमर उजाला
काशी के गोपाल द्वारा गौरैया संरक्षण के लिए तीन साल पहले शुरू की गई पहल अब रंग लाने लगी है। वाराणसी समेत पांच जिलों में गोपाल व उनकी 200 वालंटियर की टोली ने 74 हजार घोंसले लगाए हैं। यहां गौरैया व उनके बच्चों को शरण मिल रही है। इससे लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी इस प्रजाति का कुनबा बढ़ने लगा है।

लॉकडाउन में भी गोपाल ने सोशल मीडिया के जरिए बच्चों, युवाओं और महिलाओं को जागरूक किया। गोपाल बताते हैं कि सोशल मीडिया पर अभियान शुरू कर लोगों से घोंसला तैयार कर अपने घर पर रखवाया था, वहां अब गौरैयों का आना शुरू हो चुका है। गोपाल व उनकी टीम ने अब तक 60 बच्चों को घोंसला बनाने का प्रशिक्षण दिया है।

ऐसे बढ़ेगा गौरैया का कुनबा
- छत, पार्क व बालकनी में बर्तन में दाना पानी भरकर रखें।
- प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा करें।
- घर के बाहर ऊंचाई व सुरक्षित जगह लकड़ी के घोंसले लटका सकते हैं।
- आंगन व पार्कों में कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी के पौधे लगाएं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें