बलिया में भू-गर्भ जल की स्थिति
बलिया सहित पूर्वांचर के जिलों में भू-गर्भ जल की स्थिति को देखा जाए तो आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, संतरविदासनगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र जिलों में शुद्ध पुनर्भरण जल क्षमता क्रमशः 1329, 483, 890, 1243, 1251, 717, 486, 400, 478 एवं 211 मिलियन घनमीटर, शुद्ध जल निकास क्षमता क्रमशः 865, 338, 589, 1106, 856, 273, 419, 370, 361एवं 91 मिलियन घनमीटर तथा भू-गर्भ जल विकास स्तर क्रमशः 65.70, 69.90, 66.24, 88.98, 68.45, 38.02, 86.28, 92.25, 62.38 एवं 43,12 प्रतिशत है। इसके अनुसार आजमगढ़, मऊ, बलिया एवं गाजीपुर जिले धूमिल संभावना क्षेत्र के अंतर्गत आ गए हैं, जबकि जौनपुर, वाराणसी एवं संतरविदासनगर जिले संभावना विहीन क्षेत्र के अन्तर्गत आ गए हैं। यानि कि इन जिलों में भू-जल दोहन को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। धूमिल संभावना क्षेत्र वाले जनपदों में भी जल उपयोग को संतुलित किया जाना चाहिए। इन सभी जनपदों में जलविदोहन करना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है।
भू-गर्भ जल में गिरावट के प्रमुख कारण :
- वर्षा वितरण में असमानता एवं वर्षा में कमी का होना।
- अधिकांश क्षेत्रों में सतही जह का अभाव।
- पेयजल आपूर्ति हेतु भू-जल का अधिक दोहन।
- सिंचाई हेतु भू- जल का अत्यधिक दोहन।
- उद्योगों हेतु भू-जल का अत्यधिक दोहन।
भू-गर्भ जल दोहन रोकने हेतु उपाय :
- भू-जल समस्या का एकमात्र उपाय भू-जल में हो रही कमी को रोकना है। प्रत्येक स्तर पर भू-जल के अनियंत्रित एवं अतिशय दोहन और शोषण एवं उपयोग पर रोक लगाना आवश्यक है। पुराने जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। जल ग्रहण क्षेत्रों में अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना होगा ताकि प्राकृतिक रूप से जल का पुनर्भरण होता रहे।
- बचत प्रक्रिया को अपनाना होगा।
- जल बर्बादी को रोकना होगा।
- विकल्प कीक्षखोज करनी होगी।
- सुरक्षित एवं संरक्षित उपयोग करना होगा।
- जल को प्रदूषण से बचाना होगा।
- वर्षा जल का अधिक से अधिक संचयन करना होगा।
- जल संपूर्ति की सुरक्षित एवं संचयित प्रक्रिया अपनानी होगी।
- भूमिगत जल को चिरकाल तक स्थायी रखना होगा।
- कुल वर्षा जल का कमसे कम 31 प्रतिशत जल धरती के अंदर प्रवेश कराने की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) को बढ़ावा देना होगा।