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वर्ल्ड ऑटिज्म अवेयरनेस डे : जन्म के पहले तीन साल में ही नजर आने लगते हैं लक्षण

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आपका बच्चा अपने में गुमसुम तो नहीं रहता है। यदि ऐसा है तो ऑटिज्म के लक्षण होे सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऑटिज्म एक मानसिक रोग या मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला विकार है। इसके लक्षण जन्म से या बाल्यावस्था (पहले तीन साल में) में ही नजर आने लगते हैं। यह व्यक्ति की सामाजिक कुशलता और संप्रेषण (अपनी बात को दूसरे तक पहुंचाना) क्षमता पर विपरीत प्रभाव डालता है। आमतौर पर लोग ऑटिज्म के शिकार बच्चों को मंदबुद्धि कहते हैं। मंडलीय अस्पताल के बाल रोग विभाग के ओपीडी में आने वाले 60 से 80 बच्चों में औसतन तीन से पांच बच्चे ऐसे आते हैं, जिनमें ऑटिज्म के लक्षण पाए जाते हैं। ऐसे बच्चों को चिकित्सक बाल मनोवैज्ञानिक को दिखाने की सलाह देते हैं। ऑटिज्म प्रभावित लोगों विशेषकर बच्चों के जीवन को और बेहतर बनाने के लिए हर साल दो अप्रैल को हर साल विश्व ऑटिज्म अवेयरनेस दिवस (विश्व आत्मकेंद्रित जागरूकता दिवस) के रूप में मनाया जाता है।
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मंडलीय अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सीपी गुप्ता बताते हैं कि जन्म के छह माह बाद बच्चे कुछ आवाजें निकालने लगते हैं, अगर आपका बच्चा इस तरह की गतिविधियां नहीं करता तो संभव है कि वह ऑटिज्म का शिकार हो। ऐसे बच्चों को बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। बिहेवियर थेरेपी के जरिए ऐसे बच्चों को ठीक किया जा सकता है। ऐसे बच्चों में दवा से कहीं ज्यादा जरूरी है उसकी काउंसिलिंग।
दीनदयाल अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष तिवारी बताते हैं कि न्यूरो संबंधी डिस ऑर्डर है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चा आंख से आंख मिलाकर बात नहीं करता है। घर में मौजूद दूसरे बच्चों में घुलने-मिलने के बजाय अपने आप में खोया रहता है। ऐसे बच्चों में बोलने और सामाजिक व्यवहार में परेशानी होती है। इसका पता लगाने के लिए मॉलिक्युलर और सेल्युलर लेवल पर जांच की जाती है। इसके बाद बच्चों का उसकी जरूरत के अनुसार इलाज शुरू किया जाता है।
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ऑटिज्म के लक्षण
- 12 से 13 माह के बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण नजर आने लगते हैं।
- इस विकार में व्यक्ति या बच्चा आंख मिलाने से कतराता है।
- किसी दूसरे व्यक्ति की बात को न सुनने का बहाना करता है।
- आवाज देने पर भी कोई जवाब नहीं देता है। अव्यवहारिक रूप से जवाब देता है।
- माता-पिता की बात पर सहमति नहीं जताता है।
- आपके बच्चे में इस प्रकार के लक्षण हैं तो आपको डॉक्टर से परामर्श लें
क्या बरतें सावधानियां
- आप अपने बच्चे की गतिविधियों में बदलाव लाने की कोशिश करें।
- उसके खानपान, रहन-सहन और जीवनशैली पर अधिक ध्यान दें।
- अपने बच्चे को संकुचित न होने दें। उसे रोजना नए लोगों से परिचय कराएं।
- इसके बाद लगातार काउंसिलिंग से बच्चे की सेहत में सुधार हो सकता है।
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