सिंदूर खेला कथा प्रसंग का आयोजन
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देवी भागवत कथा का श्रवण कराते हुए बालव्यास श्रीकांत शर्मा ने कहा कि राक्षस तीनों लोकों पर तो राज कर लेते हैं लेकिन स्वयं पर नियंत्रण नहीं कर पाते। वहीं संत स्वयं पर राज करते हैं। बाहर के शत्रुओं पर विजय पाना सरल है। अंदर के शत्रुओं पर जीत हासिल करना सबसे कठिन है। यही वजह है कि राक्षस इंद्रियों पर विजय नहीं प्राप्त कर पाते।
बालव्यास ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति कभी भी नारियों की निंदा नहीं करती और ना ही उन्हें कमजोर समझती है। राक्षसों ने हमेशा स्त्री शक्ति को कमजोर समझा। यही कारण है कि बड़े-बड़े राक्षसों का संहार मां भगवती ने विभिन्न रूप धारण कर किया। भारत में मां को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है जो शक्ति का प्रतीक है। कथा प्रसंग में बालव्यास ने शुम्भ- निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड की कथा, रक्तबीज की कथा, दुर्गा सप्तशती की कथा प्रसंगों का वर्णन किया।