डॉ संपूर्णानंद, त्रिभुवन सिंह, रघुनाथ सिंह और पं कमलापति त्रिपाठी जैसे बड़े नेता भूमिगत होकर आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए। करीब सप्ताह भर तक इन नेताओं ने पुलिस को छकाया। तब तक भारत छोड़ो आंदोलन की मुहिम वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में पहुंच चुकी थी।
कुलपति ने की घोषणा तो निकला जुलूस
राजीव गांधी स्टडी सर्किल के प्रो सतीश राय का कहना है कि बीएचयू में कुलपति डॉ राधाकृष्णन का भाषण चल रहा था। उन्हें किसी ने पर्ची पकड़ाई तो कुलपति ने घोषणा करते हुए कहा कि महात्मा गांधी गिरफ्तार हो गए हैं।
इसके बाद 10 अगस्त 1942 को बीएचयू से दशाश्वमेध तक जुलूस निकाला गया। जुलूस बढ़ता गया और कारवां जुड़ता गया। 11 अगस्त को ऐसा ही जुलूस कचहरी तक गया। अंग्रेजों की घुड़सवार पुलिस को देख महिलाओं को आगे कर दिया गया। यहां एक 11 साल के एक लड़के ने हौसला दिखाया और डीएम कार्यालय पर लगे अंग्रेजों के झंडे को उतार कर तिरंगा फहरा दिया।
12 अगस्त को काशी विद्यापीठ को डकैतों का अड्डा बताकर ताला चढ़ा दिया गया। 13 को बीएचयू बंद हुआ। 14 और 15 को पूरे पूर्वांचल में जगह-जगह जुलूस निकाले गए। रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। इस लड़ाई में राजनारायण, राम मनोहर लोहिया, रुस्तम सैटिन, विरेश्वर मुखर्जी आदि शामिल रहे।