पूनम आज जिस मुकाम पर हैं, उसमें उनके पिता और बड़ी बहन का बहुत योगदान है। उन्होंने घर के बागीचे में ही बेटियों के वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण शुरू कराया। बेटियों को खेल खिलाने पर गांव के लोगों ने तो ताना मारना शुरू कर दिया था लेकिन पिता ने हार नहीं मानी।
पूनम की मां ने बताया कि उसके पिता कैलाश ने कर्णम मल्लेश्वरी का गेम्स देख कर बेटी को वेटलिफ्टर बनाया। 2011 में बड़ी बहनों को देखकर पूनम ने ग्राउंड जाना शुरू किया। गरीबी के चलते पूरी डाइट नहीं मिल पाती थी। मुफलिसी का आलम ये था कि 2014 ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में हिस्सा लेने के लिए पूनम के पिता ने भैंस बेच दिए थे।
जब वहां कांस्य पदक जीता तो मिठाई बांटने के लिए पैसे नहीं थे। मां बाप के खेतों में काम से लेकर घर में भैंस और अन्य जानवरों को चारा देने तक का काम पूनम ही करती थी, लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। तमाम चुनौतियों पर विजय पाते हुए पूनम यादव ने कई पदक जीते।