बम धमाके में घायल हुए लोग
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अस्सी के रहने वाले विद्याभूषण मिश्र का परिवार उस मंजर को नहीं भूल पाता है। विद्याभूषण की भतीजी गरिमा आज भी कहीं जब कोई आतिशबाजी होती है सहम उठती है। संकट मोचन मंदिर में परिवार के संग दर्शन पूजन को गए विद्या भूषण की डेढ़ साल की बेटी शिवांगी की धमाके मौत हो गई थी। जबकि भतीजी गरिमा और पत्नी सुशीला भी धमाके में घायल हुई थी।
सुशीला के गले में बारूद के कण गहने निशान दे चुके हैं। धमाके की चर्चा होते ही विद्या भूषण मिश्र की आंखें आंसुओं से भर जाती है। रूंधे गले से कहा कि आतंकियों का उनकी डेढ़ साल की मासूम बच्ची शिवांगी ने क्या बिगाड़ा था। वलीउल्लाह को फांसी से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए, वह दया का पात्र नहीं है।
मासूम बेटी की हुई थी दशाश्वमेध ब्लास्ट में मौत
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दशाश्वमेध घाट पर हुए बम धमाके में अपनी बेटी स्वास्तिका को खोने वाले संतोष शर्मा कहते हैं कि बम धमाकों में बेगुनाहों की जान लेने वालों को सजा-ए-मौत मिलनी चाहिए। उस समय अस्सी पर रहने वाले संतोष शर्मा कहते हैं कि बेटी के नहीं रहने का गम आज भी बहुत है।
11 माह की मासूम बच्ची ने किसी का क्या बिगाड़ा था, ऐसे आतंकियों को समय रहते ही सूली पर चढ़ा देना चाहिए था। खैर, देर आए दुरूस्त आएं। अब दोषी को फांसी से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए। उन आत्माओं को तभी शांति मिलेगी, जब वह उसी तरह की मौत मरेगा।
तीन दिन तक कोमा में थी सुशीला
धमाके के उस मंजर को याद कर आज भी गरिमा सहम उठती हैं। उस समय सात साल की रहीं गरिमा कहती है कि बड़ी मां सुशीला के जबड़े से खून बह रहा था। हाथ में छोटी बहन शिवांगी को लेकर बदहवास होकर अस्पताल के गेट पर पहुंचते ही मां अचेत हो गई थी। चिकित्सकों ने उन्हें भर्ती किया लेकिन मासूम बहन शिवांगी ने दम तोड़ दिया। बच्ची की मौत के सदमे और धमाके से सुशीला तीन दिन तक कोमा में रहीं। कई वर्ष इलाज के बावजूद आज भी उनके चेहरे पर धमाके के निशान मौजूद हैं।
संतोष शर्मा ने कहा कि वो मंजर आज भी याद करके रूह कांप जाती है। बेटी की याद आज भी परिवार को बेटी की कमी खलती है। दशाश्वमेध घाट पर हुए ब्लास्ट में बेटी को खोने के बाद कई दिनों तक नींद नहीं आई थी। जब भी आंख बंद करते थे तब वहीं मंजर सामने आता था और बेटी स्वास्तिका का चेहरा सामने आ जाता था। आज उसके गुनहगार को सजा मिल रही है इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। फैसला देर से आ रहा है लेकिन इससे ऐसे गुनाह को अंजाम देने वाले लोगों को एक सबक मिलेगी और गुनाह करने से पहले सोचेंगे।
संकटमोचन ब्लास्ट के बाद से ही मंदिर में अब शादियां नहीं होती हैं। सात मार्च 2006 को मंगलवार का दिन था। उस समय संकटमोचन मंदिर में शादियां हो रही थी। यही नहीं वहां पर यज्ञ व हवन पूजन चल रहा था। बम ब्लास्ट के बाद से मंदिर प्रबंधन ने सुरक्षा कारणों से यहां होने वाली शादियों पर रोक लगा दी है।
जिस समय ब्लास्ट हुआ था उस समय फोटोग्राफर हरीश बिजलानी शादी की फोटो खींच रहे थे। ब्लास्ट में उनकी मौत हो गई थी। ब्लास्ट के पहले तक यहां शादी विवाह से जुड़े कई आयोजन होते थे। आर्थिक रूप से कमजोर लोग इसी मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर शादियां करते थे। जब से इस मंदिर में शादियों पर रोक लगी है, तब से लोग आस पास के दूसरे मंदिरों में जाकर शादी समारोह करते हैं। मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने बताया कि बम विस्फोट के बाद सुरक्षा कारणों को देखते हुए यहां शादियों पर प्रतिबंध लगा है।
संकट मोचन मंदिर के महंत।
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संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने कहा कि सात मार्च 2006 मंगलवार का दिन आज भी नहीं भूलता है। हादसे की सूचना के बाद जब हम मौके पर पहुंचे तो विस्फोट के बाद परिसर में धुआं-धुआं सा था। लोग घायलों की मदद में लगे थे और उनको अस्पताल पहुंचाया जा रहा था। संकटमोचन की कृपा ही थी कि यहां पर बहुत जनहानि नहीं हुई थी, अस्पताल जाने वाले सभी लोग स्वस्थ होकर घर लौटे।
प्रो. मिश्र ने बताया कि मंगलवार की शाम को जब मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ थी इसी दौरान तेज धमाके के साथ विस्फोट हुआ था। मैं पिताजी व तत्कालीन महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र के साथ मौके पर पहुंचा। मौके की हालत देखकर तो हम सभी सन्न रह गए थे। घटना के बाद से ही परिसर में सुरक्षा के इंतजाम सख्त कर दिए गए हैं।
अब परिसर में न तो कोई मोबाइल लेकर आ सकता है ना ही कोई इलेक्ट्रानिक गैजेट। बम धमाके के दोषी वलीउल्लाह को तो इस मामले में कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए जिससे कि हादसे के पीड़ितों के घाव पर कुछ तो मरहम लग सके। इस मामले में सजा देने में देरी नहीं होनी चाहिए क्योंकि अब तक 16 साल बीत चुके हैं। धार्मिक स्थानों पर इस तरह की घटना वैमनस्यता फैलाने का काम करती है।