रथ के शिखर पर लगता है चांदी का ध्वज
भगवान के रथ के शिखर पर चांदी का ध्वज और चक्र लगाने की व्यवस्था है। जब भगवान रथ पर सवार होते हैं तब चांदी के डंडे में चांदी का ध्वज लगाया जाता है। इसमें दोनों ओर हनुमान जी विराजमान हैं। त्रिकोणीय ध्वज की ऊंचाई पांच फीट और लंबाई डंडे से नोक तक तीन फीट है।
अष्टकोणीय गर्भ गृह के मुख्य द्वार के ऊपर सामने रजत पत्र पर केंद्र में श्रीगणेश जी एवं ऋद्धि-सिद्धि विराजमान हैं। नीचे दाहिने सूर्यदेव और बाएं चंद्रदेव विराजमान हैं। दाहिने ओर बाएं द्वार के ऊपर श्रीकृष्णजी नृत्य की मुद्रा में विराजमान हैं। उसके नीचे दायीं ओर मेरू यंत्र और बायीं ओर श्रीविष्णुदेव यंत्र है।
यंत्राकार रथ में लोहे के कुल 14 पहिये लगे हैं। हर पहिये में 12 तीलियां हैं। जिसमें आगे के दो पहियों में रथ को घुमाने के लिए 2006 में स्टीयरिंग की व्यवस्था की गई है। इसका संचालन रथ के पीछे से किया जाता है। रथ के अग्रभाग के केंद्र में सारथी विराजमान होते हैं जो कांस्य धातु के हैं। इस पर चांदी के पानी की पॉलिश है। रथ के आगे दो कांस्य के अश्व लगाए जाते हैं। इनके ऊपर चांदी के पानी की पॉलिश होती है।
प्रह्लाद घाट स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर।
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1802 में हुआ था रथ का निर्माण
जगन्नाथ मंदिर की स्थापना पंडित बेनीराम और पंडित विश्वंभर ने सन 1790 में की थी। इसके बाद सन 1802 में रथ का निर्माण कराया गया और काशी के पहले लक्खा मेले रथयात्रा की शुरुआत हुई।
इसके बाद श्रीराव प्रहलाद दास शापुरी ने सन 1965 में रथ के कलेवर को बदल दिया। इसके निर्माण में पुराने रथ के काष्ठ का प्रयोग भी किया गया था। उनके निधन के बाद उनके पुत्र दीपक शापुरी और आलोक शापुरी रथयात्रा महोत्सव का संचालन कर रहे हैं।
सिर्फ जगन्नाथ जी अपने परिवार के साथ निकलते हैं मंदिर के गर्भगृह से
जगन्नाथ मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की प्राण प्रतिष्ठित प्रतिमाएं कभी गर्भगृह से बाहर नहीं निकलती हैं। केवल भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र के विग्रह अपने गर्भगृह से तीन दिनों की रथयात्रा के लिए बाहर निकलते हैं।
रथयात्रा मेले के दौरान सादे कपड़ों में तैनात रहेंगे पुलिस कर्मी
तीन दिवसीय रथयात्रा मेले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर अपर पुलिस आयुक्त एस चनप्पा बीती शाम जगन्नाथ मंदिर पहुंचे। मंदिर के मुख्य पुजारी राधे श्याम पांडेय से रथयात्रा निकलने से लेकर दर्शन-पूजन के क्रम सहित अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बातचीत की।
कहा कि बैरिकेडिंग कराने के साथ ही अस्सी से रथयात्रा तक प्रत्येक महत्वपूर्ण पॉइंट पर पुलिस तैनात की जाएगी। रथयात्रा क्षेत्र में रूट डायवर्जन की व्यवस्था की जाएगी। श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच सादे कपड़ों में महिला-पुरुष पुलिस कर्मी तैनात रहेंगे।
इसके साथ ही दमकल का वाहन भी मेला क्षेत्र में रहेगा। इस दौरान उन्होंने भेलूपुर और सिगरा थानाध्यक्ष को रथयात्रा मेले के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरतने का निर्देश दिया।
राजातालाब में लगने वाले रथयात्रा मेले का रथ काशीराज परिवार के सदस्य ही खींचते हैं। सात और आठ जुलाई को लगने वाले रथयात्रा मेले की तैयारियां शुरू हो गई हैं। रथयात्रा की शुरुआत राजातालाब स्थित महाराज के पुराने किले में स्थित महाराज बलवंत सिंह महाविद्यालय परिसर से होगी।
सात जुलाई से शुरू होने वाले रथयात्रा मेले में काशीराज परिवार के अनंत नारायण सिंह रथ खीचेंगे और इसके बाद श्रद्धालु हर-हर महादेव का उद्घोष करते हुए रथ को खींचकर भैरव तालाब तक ले जाते हैं। इस समय रथ की मरम्मत का कार्य चल रहा है।
ठाकुर जी के मंदिर में रथ को ठीक किया जा रहा है। निर्माण कार्य की देखरेख राजेश्वर नारायण सिंह कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रथ को दुरुस्त किया जा रहा है। दूसरी ओर राजातालाब के प्राचीन किले में काशीराज परिवार के अनंत नारायण का दरबार लगाने की तैयारी की जा रही है। दरबार का रंग रोगन कर दिया गया है और क्षेत्र के सम्मानित लोगों को निमंत्रण पत्र भेजा जा चुका है।
रथयात्रा के दिन रथ को खींचने से पूर्व अनंत नारायण सिंह अपने नजदीकियों से बातचीत करने और नजराना प्राप्त करने की रस्म निभाते हैं। क्षेत्र के जक्खिनी, वीरभानपुर, मोतीकोट, बखरिया आदि गांव के लोगों को निमंत्रित करने की परंपरा चली आ रही है।
जक्खिनी निवासी अमरेश्वर नारायण सिंह, मोतीकोट निवासी तोयज सिंह और बखरियां निवासी राजेश सिंह बताते हैं कि वे लोग महाराज के साथ दरबार में विचार विमर्श करते हैं और सभी लोगों का हाल-चाल लेते हैं। रथ भैरव तालाब में दो दिन लक्ष्मी नारायण पर मंदिर पर रुका रहता है और श्रद्धालु भक्तजन भगवान जगन्नाथ के दर्शन पूजन करते हैं।