उन्होंने कहा कि बुद्धत्व की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करने के लिए जीवन में जिन आदर्शों की आवश्यकता होती है, उनका बीजारोपण जातक कथाओं के माध्यम से होता है। आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि आत्मिक सुख की प्राप्ति केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज के सभी जीवों की मुक्ति और परोपकार में निहित है।
बौद्ध दर्शन और सनातन परंपरा के संबंधों पर उन्होंने कहा कि आत्मिक सुख ही परम सत्य है और अपने साथ सभी की मुक्ति के लिए जीना ही ‘करुणा’ का मूल तत्व है। ‘महाकपि जातक’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों के लिए अपना सब कुछ त्याग देना ही नेतृत्व का वास्तविक धर्म है।
बोधिसत्व धर्म की इसी करुणा ने आगे चलकर वैष्णव धर्म और भारतीय भक्ति आंदोलन को भी गहराई से प्रभावित किया। कार्यक्रम में बीएचयू के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार, प्रो. प्रकाश उदय, प्रो. मृदुला सिन्हा और प्रो. मनोज राय आदि ने भी विद्यार्थियों को संबोधित किया।