अथर्ववेद में भी मिलता है वाराणसी का उल्लेख
वाराणसी का वास्तविक इतिहास शायद इतिहास के पन्नों से भी पुराना है। यह विश्व के प्राचीन नगरों में से एक है। पुराणों के अनुसार मनु से 11वीं पीढ़ी के राजा काश के नाम पर काशी बसी। वहीं वाराणसी नाम पड़ने के बारे में अथर्ववेद में वाराणसी को वरणावती नदी से संबंधित कहा गया है। वरणा से वाराणसी शब्द बना है। कुछ वरुणा व असि नदी के बीच बसने की वजह से दोनों नदियों के नाम पर इसे वाराणसी शब्द समझते हैं। काशी के पांच नाम प्रचलित रहे हैं। काशी अविमुक्त, आनंद कानन और महाश्मशान। पुराणों में इनका उल्लेख मिलता है। -पद्मश्री महामहोपाध्याय भगीरथ प्रसाद त्रिपाठी वागीश शास्त्री
एक मत के अनुसार अथर्ववेद में वरणावती नदी का जिक्र आया है, जो आधुनिक काल में वरुणा का पर्याय माना जाता है। वहीं असि नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा गया है। अग्निपुराण में असि नदी को नासी का भी नाम दिया गया है। पद्यपुराण में भी दक्षिण-उत्तर में वरुणा और असि नदी का जिक्र है। मत्स्यपुराण में वाराणसी का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता। प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन्न क्षेत्रे मम प्रिये। इसके अतिरिक्त भी विविध धर्म ग्रंथों में वाराणसी, काशी और बनारस सहित यहां के पुराने नामों के दस्तावेज मौजूद हैं। - डॉ. रामनारायण द्विवेदी, मंत्री, काशी विद्वत परिषद
प्राचीन वाराणसी सदैव बरना पर ही स्थित नहीं थी, गंगा तक उसका प्रसार हुआ था। कम से कम पतंजलि के समय में अर्थात ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तो यह गंगा के किनारे-किनारे बसी थी, जैसी कि अष्टाध्यायी के सूत्र पर पतंजलि ने भाष्य अनुगङ्ग: वाराणसी, अनुशोणं पाटलिपुत्रं से विदित है। मौर्य और शुंग युग में राजघाट पर गंगा की ओर वाराणसी के बसने का प्रमाण हमें पुरातत्व के साक्ष्य से भी लग चुका है। वरणा शब्द एक वृक्ष का ही द्योतक है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे। जैसे कोशंब से कौशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो। - पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य
इतिहास पर गौर करें तो बनारस में बस्तियों का विस्तार चौदहवीं से लेकर अठारहवीं सदी के बीच हुआ। आपस में गूंथे मकान, संकरी-पथरीली गलियां, प्राचीन शैली में बनावट व व्यापार के पुरातन तरीके हर एक को अचंभित करते हैं। इनमें भवन एक दूसरे में कुछ इस तरह गूंथ कर बने हैं कि कई गलियां भगवान भास्कर की रोशनी तक के लिए तरस जाती हैं लेकिन तपती गर्मी में भी इन मोहल्लों के घर शीतलता का अहसास कराते हैं। - पद्मभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र