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शहरी सीमा बढ़ी पर परिवहन सुविधा नहीं

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शहरी सीमा में विस्तार तो हुआ, लेकिन परिवहन संबंधी सुविधाओं में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का लाभ अभी भी शहरी सीमा में शामिल हुए लोगों को नहीं मिल पा रहा है। सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज की अधिकतर बसें उन इलाकों में नहीं पहुंच रही हैं, जहां उन्हें पहुंचना चाहिए। अधिकतर इलाकों में यात्रियों और बसों के ठहराव के लिए स्टैंड तक नहीं बनाए जा सके हैं। ऐसे में लोगों को ऑटो और अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
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काशी और कैंट डिपो के अंतर्गत संचालित होने वाली सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज की 130 बसें अब जर्जर हो चुकी हैं। लगभग 90 से 95 बसें ही जर्जर हाल में शहर और ग्रामीण इलाकों में दौड़ भी रही हैं। किसी बस की खिड़कियों में शीशा नहीं है तो अधिकतर बसों के अंदर की सीटें और फर्श भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। अधिकतर बसों में खिड़कियां पर शीशे के स्थान पर टीन की चादरें लगी हैं।
तकरीबन 15 वर्ष पहले बसपा सरकार में जेएनयूआरएम के तहत मिली इन सिटी बसों में छोटी और बड़ी दोनों शामिल हैं। छोटी बसें गोलगड्डा, पीलीकोठी, विंध्याचल, चंदौली के सैयदराजा और पिंडरा इलाके में चलाई जा रही हैं, वहीं बड़ी बसें जलालपुर, कछवा रोड और शाम को कैलहट मिर्जापुर तक चलाई जा रही हैं। जबकि शहर के कई ऐसे स्थान हैं जहां अभी भी बसों का संचालन नहीं शुरू हो सका है। सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज अधिकारियों के अनुसार शहर में ट्रैफिक जाम लगने के कारण बसों की संख्या कम कर दी गई है। छोटी बसों के बेड़े में शामिल 50 बसें रोजाना सड़क पर निकल रही हैं तो 45 से 50 बड़ी बसें रोजाना चलाई जा रही हैं। सारनाथ, चौबेपुर, बाबतपुर, हरहुआ, रामेश्वरम, फूलपुर, चंदवक, दानगंज, चोलापुर, रोहनिया, मिर्जामुराद, रामनगर, पड़ाव आदि इलाकों में बसों का संचालन कराया जा रहा है। छोटी बसें लंका, चितईपुर, लहरतारा, लोहता, केराकतपुर आदि इलाकों में चलाई जा रही हैं।
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वर्कशॉप में महीनों से खड़ी हैं 30 फीसदी बसें
सिटी बसें अपने समयावधि को पूरी कर चुकी हैं। दो लाख किमी से अधिक चल चुकीं इन बसों को अभी भी दौड़ाया जा रहा है। काशी और कैंट डिपो को मिलाकर कुल 130 बसों में 30 फीसदी बसें एकदम जर्जर होकर महीनों से कैंट स्थित वर्कशॉप में खड़ी हैं। मोटर पार्ट्स और अन्य बसों में कोई खराबी होती है तो कर्मचारी एक दूसरी बसों के पार्ट का उपयोग कर रहे हैं।
सिटी बसों में यात्रा करना खतरे को दावत देने के बराबर है। खिड़कियों में शीशे ही नहीं मिलेंगे। फर्श और सीटें भी क्षतिग्रस्त हैं। सारनाथ में बसों के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।- प्रकाश जायसवाल, यात्री, सारनाथ
सलारपुर और अन्य गांवों के लोगों को बस के इंतजार में आशापुर चौराहे पर जाना पड़ता है। सुबह एक बार बस आ गई तो फिर शाम को शायद ही आए।-दीपेश सेठ, यात्री, सारनाथ
कई जगहों पर यात्रियों के ठहराव के लिए बनाए गए स्टैंड धूल धूसरित हैं। टीनशेट वगैरह सब गायब भी हो चुके हैं। बसों के बजाय ऑटो को ज्यादा तरजीह देते हैं।-विकास सिंह विक्की, यात्री आशापुर,
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एक नजर
-130 बसें है सिटी ट्रांसपोर्ट के बेड़े में
-70 बसें है काशी डिपो में
-60 बसें है कैंट डिपो में
-28 सीटर की है छोटी बसें
-40 सीटर की है बड़ी बसें
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