पिंडक्रिया : यह प्रश्न स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गई अन्न सामग्री पितरों को कैसे मिलती है। वायुपुराण के अनुसार नाम गौत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नम नयन्ति तम। अपि योनिशतम प्राप्तान्सतृप्तिस्ताननुगच्छन्ति। अर्थात श्राद्ध में दिए गए अन्न को नाम, गोत्र, हृदय की श्रद्धा, कल्पपूर्वक दिए हुए पदार्थ, भक्तिपूर्वक उच्चारित मंत्र, उनके पास भोजन रूप में उपलब्ध होते हैं।
ब्राह्मण भोजन : मनुस्मृति के अनुसार निमन्त्रितान हि पितर उपतिष्ठन्ति तान द्विजान। वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासिनानुपासते। अर्थात श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण में पितर गुप्त रूप से प्राणवायु की भांति उनके साथ भोजन करते हैं। मृत्यु के पश्चात पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं, इसलिए वह दिखाई नहीं देते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि तिर इव वै। पितरो मनुष्येभ्य। अर्थात सूक्ष्म शरीरधारी पितर मनुष्यों से छिपे होते हैं।