मां का नाम आते ही एक ऐसी देवी की प्रतिमा सामने साकार हो जाती है जो बस प्रेम बरसाना जानती है। शिष्य हों, बेटे-बेटियां हों या फिर कोई रिश्तेदार। मां तो बस ऐसी ही थी। वह अक्सर कहती थीं कि जिस दिन गाना खत्म हो जाएगा उस दिन मैं नहीं रहूंगी। बस रियाज करते-करते ही वह इस फानी दुनिया को अलविदा कह गईं। मां आज भी मेरे आसपास ही रहती हैं, वह तो संगीत में जिंदा हैं। मशहूर शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी (अप्पा जी) का जन्म, 8 मई 1929 को बनारस के भूमिहार जमींदार रामदेव राय के परिवार में हुआ था।
पद्मविभूषण गिरिजा देवी की इकलौती बेटी डॉ. सुधा दत्ता की आवाज में अपनी मां को याद करते हुए दर्द झलक उठा। जयंती की पूर्व संध्या पर डॉ. दत्ता ने कहा कि 2017 में मैंने मां के लिए गीत लिखा था लेकिन उनको सुना नहीं पाई। जब उन्होंने 24 अक्तूबर 2017 को अंतिम सांस ली तो उसके एक दिन पहले तक वह शिष्यों को रियाज ही करा रही थीं।
बनारस में बसता था दिल
मां ने तो दिल खोलकर सीखा और मरते दम तक अपने शिष्यों को वही जज्बा कायम रखने की सलाह भी देती रहीं। मां भले ही कोलकाता में रहें लेकिन उनका दिल उनके बनारस में ही बसता था। वह जितनी अच्छी कलाकार थीं उतनी ही अच्छी मां भी थीं। उनके जीवन में अनुशासन बहुत था। वह अपने शिष्यों को भी सिखाती थीं कि पहले अपनी जिम्मेदारियों और संबंधों पर ध्यान दें उसके बाद संगीत का रियाज करें।