पद्मश्री मालिनी अवस्थी का कहना है कि बनारस उनके तन, मन, वाणी और कर्म में बसता था। वह हमेशा कहती थीं कि बनारस की इस कला को जिंदा रखो। नई पीढ़ी के लिए वह एक जीती जागती मिसाल थीं। वह कला की साधक थीं और उनका संगीत अद्भुत था, वह किसी ईश्वरीय जादू की तरह था। शास्त्रीय गायक पंडित राजन और साजन मिश्र का कहना है कि ऐसे संगीत उपासक तो सौ-सौ साल में कभी कभार पैदा होते हैं।
पढ़ेंः
बीएचयू में सबसे अलग थी अप्पा जी की क्लास, संगीत-मंचकला संकाय में विजिटिंग प्रोफेसर रहीं गिरिजा देवी
खयाल के बाद ठुमरी उत्तर भारत की सबसे ज्यादा प्रचलित संगीत विधा है। इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई, इस बारे में स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं। हालांकि माना जाता है कि 15वीं सदी तक इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।
ठुमरी के ऐतिहासिक प्रमाण की बात करें तो 19वीं सदी में इसे शास्त्रीय नृत्य कथक से जोड़ा जाता था। इसे बंदिश की ठुमरी कहा गया और यह मुख्य रूप से लखनऊ में नवाब वाजिद अली शाह से काल में फली-फूली।
ठुमरी के नए प्रारूप का उदय 19वीं सदी के अंतिम दिनों में हुआ और यह सभी बंधनों से मुक्त है। यह किसी नृत्य से संबद्ध नहीं है और इसका विकास बनारस में हुआ, जिसे बोल-बनाव कहा जाता है।
ये हैं ठुमरी के बड़े नाम
बड़ी मोतीबाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी को ठुमरी का बड़ा नाम माना जाता था। पंडित महादेव मिश्रा को तो ठुमरी सम्राट के नाम से भी पुकारा जाता था, जबकि पंडित छन्नूलाल मिश्र अब भी अपनी ठुमरी से श्रोताओं के कानों में रस घोल रहे हैं। गौहर जान, बेगम अख्तर, शोभा गुर्टू, नूर जहां और प्रभा आत्रे का नाम भी ठुमरी गायकों के बीच बड़े ही सम्मान से लिया जाता है।