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ठुमरी की साम्राज्ञी गिरिजा देवी को आज अर्पित की जाएगी सुरों की श्रद्धांजलि

Tue, 08 May 2018 10:51 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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काशी विरासत फाउंडेशन की ओर से अस्सी घाट पर होगा आयोजन - फोटो : अमर उजाला
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पद्मविभूषण गिरिजा देवी की जयंती पर काशी के कलाकारों द्वारा सुरों की श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। ठुमरी की साम्राज्ञी को नमन करने के लिए शहर में संगीत के विविध आयोजनों की तैयारी की गई है। बीएचयू के संगीत एवं मंचकला संकाय की आठ छात्राओं की प्रस्तुति ठुमरी की रानी के जयंती को यादगार बनाएगी। काशी विरासत फाउंडेशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सुर और साज की बंदिशों से अस्सी के तट पर श्रद्धांजलि दी जाएगी।
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सुर साधिका गिरिजा देवी की जयंती पर आठ मई को काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत एवं मंच कला संकाय की आठ छात्राओं का कमाल दिखेगा। आठ छात्राओं ने आठ मई को अस्सी घाट पर गिरिजा देवी की स्मृति में शास्त्रीय संगीत का आयोजन किया है।

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इसमें डॉ. रागिनी सरना का गायन, कु मार सारंग का संतूर और अंशुमान महाराज का सरोद वादन आकर्षण का केंद्र होगा। टीम लीडर शिवानी खन्ना ने बताया कि इसमें  शहर के सभी विश्वविद्यालयों में विज्ञान और वाणिज्य की पढ़ाई करने वाले युवक-युवतियों को खासतौर पर आमंत्रित किया है ताकि वे अपनी संस्कृति से परिचित हो सकें।


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प्रसिद्ध संगीतज्ञ, गायक और वादक पंडित राजेश्वर आचार्य का कहना है कि अप्पा जी बहुत ही व्यवहार कुशल थीं। अपनी इसी व्यवहार कुशल चतुरता से उनका कद स्वयं बड़ा हो जाता था और व्यक्ति उन्हें बड़ा मानने के लिए विवश हो जाता था।

वह संगीत के क्षेत्र में आलोचना की जगह समीक्षा को प्रधान मानती थीं। उनके शब्दों में कभी कठोरता नहीं होती थी। उन्हें शास्त्र का ज्ञान था, इसलिए उन्हें ज्यादा सफलता मिली।

आचार्य कहते हैं कि गिरिजा देवी जिस परंपरा की संवाहक रही हैं वह निरंतर चलती रहेगी। उनके बाद वह अपने पीछे अपने कई शिष्य छोड़कर गई हैं, जो उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएंगी। गिरिजा देवी ने अपनी कला बांटी है, जिसमें जितना पात्रता थी उसने उतनी ग्रहण की।

 
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कैसे हुई ठुमरी की शुरुआत

गिरीजा देवी - फोटो : file photo

पद्मश्री मालिनी अवस्थी का कहना है कि बनारस उनके तन, मन, वाणी और कर्म में बसता था। वह हमेशा कहती थीं कि बनारस की इस कला को जिंदा रखो। नई पीढ़ी के लिए वह एक जीती जागती मिसाल थीं। वह कला की साधक थीं और उनका संगीत अद्भुत था, वह किसी ईश्वरीय जादू की तरह था। शास्त्रीय गायक पंडित राजन और साजन मिश्र का कहना है कि ऐसे संगीत उपासक तो सौ-सौ साल में कभी कभार पैदा होते हैं। 

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खयाल के बाद ठुमरी उत्तर भारत की सबसे ज्यादा प्रचलित संगीत विधा है। इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई, इस बारे में स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं। हालांकि माना जाता है कि 15वीं सदी तक इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।

ठुमरी के ऐतिहासिक प्रमाण की बात करें तो 19वीं सदी में इसे शास्त्रीय नृत्य कथक से जोड़ा जाता था। इसे बंदिश की ठुमरी कहा गया और यह मुख्य रूप से लखनऊ में नवाब वाजिद अली शाह से काल में फली-फूली।

ठुमरी के नए प्रारूप का उदय 19वीं सदी के अंतिम दिनों में हुआ और यह सभी बंधनों से मुक्त है। यह किसी नृत्य से संबद्ध नहीं है और इसका विकास बनारस में हुआ, जिसे बोल-बनाव कहा जाता है।

ये हैं ठुमरी के बड़े नाम
बड़ी मोतीबाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी को ठुमरी का बड़ा नाम माना जाता था। पंडित महादेव मिश्रा को तो ठुमरी सम्राट के नाम से भी पुकारा जाता था, जबकि पंडित छन्नूलाल मिश्र अब भी अपनी ठुमरी से श्रोताओं के कानों में रस घोल रहे हैं। गौहर जान, बेगम अख्तर, शोभा गुर्टू, नूर जहां और प्रभा आत्रे का नाम भी ठुमरी गायकों के बीच बड़े ही सम्मान से लिया जाता है।
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