वाराणसी। साहित्यकार प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि जयशंकर प्रसाद के उपन्यास को अन्य उपन्यासकारों की रचना से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। वह मुख्यतः कवि हैं। उनके साहित्य का केंद्र बिंदु काव्यात्मकता है, उनकी कहानियों का स्ट्रक्चर रोमानी है। उनका धरातल पक्का बनारसी है। वह महाकवि जयशंकर प्रसाद की जयंती पर विद्याश्री न्यास और महाकवि जयशंकर प्रसाद ट्रस्ट की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
अर्दली बाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में प्रसाद का उपन्यास साहित्य : चिंतन के विविध आयाम विषयक संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि जयशंकार प्रसाद का इतिहास बोध ऐतिहासिक और पौराणिक है। उनकी परंपरा में काशी और काशी की संस्कृति है। साहित्यकार डॉ. रामसुधार सिंह ने कहा कि प्रसाद जी मूल नाटककार और कवि के रूप में विख्यात हैं जो उनकी प्रकृति है।
अध्यक्षता कर रहे प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि प्रसाद ऐसे रचनाकार हैं जो लुक-छिप कर आते हैं पर उपन्यास में वह ऐसा नहीं कर पाते। उनका तितली उपन्यास किसानी जीवन का उपन्यास है। डॉ. इंदीवर ने कहा कि प्रसाद का उपन्यास इरावती पढ़ते हुए हमें उसके अधूरेपन की नियति को पकड़ना होगा। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि प्रसाद जी के तितली उपन्यास का मूल तत्व प्रेम ही है। स्वागत डॉ. दयानिधि मिश्र, संचालन डॉ. प्रकाश उदय, धन्यवाद ज्ञापन प्रसाद जी की प्रपौत्री डॉ. कविता प्रसाद और संयोजन कंचन सिंह परिहार ने किया। इस दौरान डाॅ. ब्रजेश पाठक को सम्मानित किया गया। इस मौके पर डॉ. अशोक कुमार सिंह, नरेंद्र नाथ मिश्र, रामानंद दीक्षित, डॉ. ऋचा सिंह, डॉ. प्रीति जायसवाल, डॉ. रंजना कुमारी गुप्ता आदि रहीं।