साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय ने बताया कि काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थी। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले साल महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जार्ज ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे ख्यातिलब्ध विद्वान इसके सदस्य बने। सभा के प्रयत्न से सन 1900 से उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रदेश में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया।
हिंदी के प्रचार और शोध के लिए 16 जुलाई, 1893 में स्थापित संस्था नागरी प्रचारिणी सभा फिलहाल अपने पूर्वजों के पुण्य-प्रताप के सहारे किसी तरह जिंदा है। नागरी प्रचारिणी के पास 20 हजार से अधिक पांडुलिपियां और 50 हजार से अधिक पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार है।
साहित्यकार डॉ. गया सिंह ने बताया कि खड़ी बोली हिंदी को आकार देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा आज बदहाली के दौर से गुजर रही है।
हिंदी की इस थाती के संरक्षण के लिए संस्था के पास पर्याप्त धन नहीं है। मामूली मानदेय पर तैनात कर्मचारी हिंदी साहित्य की इस अनमोल थाती की रखवाली कर रहे हैं। बताया कि नागरी प्रचारिणी सभा अपने हाल पर किसी तरह जिंदा है। इसका स्वतंत्रता आंदोलन में भी बहुत बड़ा योगदान रहा है।