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By Election Result: आजमगढ़ में आजादी के बाद दूसरी बार खिला कमल, जनता से दूरी के कारण हाथ से निकली विरासत की सियासत

Mon, 27 Jun 2022 10:02 AM IST
दुष्यंत शर्मा शशांक मिश्र, वाराणसी

सार

उपचुनाव में सपा प्रमुख एक बार भी आजमगढ़ नहीं आए। मतदाताओं में इस बात का मलाल रहा। भाजपा ने आजमगढ़ की जनता का दिल जीतने के लिए चौतरफा घेरेबंदी की। शुरू से बसपा के झंडाबरदार रहे गुड्डू जमाली ने बसपा के टिकट पर मुस्लिम मतों में सेंध लगाई। आजादी के बाद दूसरी बार यहां भाजपा जीत हासिल करने में कामयाब हुई।
 
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जीत के बाद भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रिश्ते आजमगढ़ के उपचुनाव में इस बार मुरझा गए। नतीजा यह रहा कि भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने सपा प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव से जीत छीन ली। विश्लेषक मान रहे हैं कि सपा की हार के पीछे सबसे बड़ा कारण सपा मुखिया अखिलेश यादव की आजमगढ़ के मतदाताओं से दूरी है। 

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उपचुनाव में सपा प्रमुख एक बार भी आजमगढ़ नहीं आए। मतदाताओं में इस बात का मलाल रहा। भाजपा ने आजमगढ़ की जनता का दिल जीतने के लिए चौतरफा घेरेबंदी की। शुरू से बसपा के झंडाबरदार रहे गुड्डू जमाली ने बसपा के टिकट पर मुस्लिम मतों में सेंध लगाई। आजादी के बाद दूसरी बार यहां भाजपा जीत हासिल करने में कामयाब हुई।

भरोसे को नहीं संभाल पाए अखिलेश यादव

पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव की धरती पर कब्जा करने वाले सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव अपने अनुभवों के आधार पर आजमगढ़ में अपना झंडा बुलंद किए रहे। इसकी पुनरावृत्ति अखिलेश यादव ने भी की। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में सपा का समीकरण आजमगढ़ में इस कदर रंग लाया कि यहां एक भी सीट पर गैर सपा प्रत्याशी की जीत नहीं हो पाई। लेकिन अखिलेश यादव इस भरोसे को संभाल नहीं पाए।

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दरअसल, विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव के इस्तीफे से आजमगढ़ की जनता में यह संदेश गया कि उनके लिए यह जिला ज्यादातर प्राथमिकता का नहीं है। इससे पहले भी अखिलेश आजमगढ़ में न तो ज्यादा सक्रिय हो पाए और न ही यहां की जनता के बीच अपने लगाव का संदेश छोड़ पाए।

दूसरी तरफ भाजपा ने यादव बिरादरी और आजमगढ़ से सटे गाजीपुर के मूल निवासी दिनेश लाल यादव को मैदान में उतारकर जनता के दिल में जगह बनाने की कोशिश की। यादव मतों के विभाजन के साथ ही अन्य मतों को रिझाने के लिए भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया। दूसरी तरफ अखिलेश यादव के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर स्थानीय प्रत्याशियों को तरजीह की बजाय सैफई परिवार के धर्मेंद्र यादव को यहां भेजा। 

ऐसे में धर्मेंद्र न तो कार्यकर्ताओं को एकजुट कर पाए और न ही पार्टी के भीतरघात से निपट पाए। यहां बता दें कि वर्ष 2014 में भाजपा की प्रचंड लहर में पूर्वांचल का गढ़ बचाने के लिए तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने आजमगढ़ में सपा की जीत दिलाई। पूरे प्रदेश में महज पांच सीटें जीतने वाली सपा ने आजमगढ़ के जरिए पूर्वांचल की सियासत को साधने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को यहां रोके रखा।
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मैनपुरी से इस्तीफा देकर उन्होंने पूर्वांचल में अपनी पकड़ बनाए रखी और वर्ष 2019 में यही विरासत उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को सौंपी। इससे पहले रमाकांत यादव के जरिए सपा कई बार इस सीट पर फतह पा चुकी है। हालांकि मुस्लिम दलित गठजोड़ के दम पर बसपा भी 1989 व 1998 में आजमगढ़ पर जीत हासिल कर चुकी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि वर्ष 2024 के आम चुनाव में ही आजमगढ़ की सही तस्वीर सामने आएगी।
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