दरअसल, विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव के इस्तीफे से आजमगढ़ की जनता में यह संदेश गया कि उनके लिए यह जिला ज्यादातर प्राथमिकता का नहीं है। इससे पहले भी अखिलेश आजमगढ़ में न तो ज्यादा सक्रिय हो पाए और न ही यहां की जनता के बीच अपने लगाव का संदेश छोड़ पाए।
दूसरी तरफ भाजपा ने यादव बिरादरी और आजमगढ़ से सटे गाजीपुर के मूल निवासी दिनेश लाल यादव को मैदान में उतारकर जनता के दिल में जगह बनाने की कोशिश की। यादव मतों के विभाजन के साथ ही अन्य मतों को रिझाने के लिए भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया। दूसरी तरफ अखिलेश यादव के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर स्थानीय प्रत्याशियों को तरजीह की बजाय सैफई परिवार के धर्मेंद्र यादव को यहां भेजा।
ऐसे में धर्मेंद्र न तो कार्यकर्ताओं को एकजुट कर पाए और न ही पार्टी के भीतरघात से निपट पाए। यहां बता दें कि वर्ष 2014 में भाजपा की प्रचंड लहर में पूर्वांचल का गढ़ बचाने के लिए तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने आजमगढ़ में सपा की जीत दिलाई। पूरे प्रदेश में महज पांच सीटें जीतने वाली सपा ने आजमगढ़ के जरिए पूर्वांचल की सियासत को साधने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को यहां रोके रखा।
मैनपुरी से इस्तीफा देकर उन्होंने पूर्वांचल में अपनी पकड़ बनाए रखी और वर्ष 2019 में यही विरासत उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को सौंपी। इससे पहले रमाकांत यादव के जरिए सपा कई बार इस सीट पर फतह पा चुकी है। हालांकि मुस्लिम दलित गठजोड़ के दम पर बसपा भी 1989 व 1998 में आजमगढ़ पर जीत हासिल कर चुकी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि वर्ष 2024 के आम चुनाव में ही आजमगढ़ की सही तस्वीर सामने आएगी।