आकाशवाणी वाराणसी के पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक पांडुरंग लक्ष्मीकांत पुराणिक।
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क्या कहते हैं रेडियो बनाने वाले
पड़ाव के सूजाबाद में रहने वाले 60 वर्षीय इकबाल खान के पास कुछ वर्षों से ट्रांजिस्टर रेडियो मरम्मत के काम आने लगे हैं। उनका अकेले का खर्चा निकल जाता है। वे बताते हैं कि जब से पीएम मोदी के मन की बात की शुरुआत हुई है, तब से कुछ लोग रेडियो को पूछने जरूर लगे हैं।
इकबाल के हाथों में उम्र की झुर्रियां जरूर पड़ गई हैं, लेकिन जब वे रेडियो बनाते हैं तो उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ जाते हैं। इस बात की तस्दीक उनकी पत्नी शैरून निशा भी करती हैं, क्योंकि एक ट्रांजिस्टर रेडियो वे भी अपने मायके से दहेज में लेकर आई थीं। एक दौर था, जब हुकुलगंज स्थित इकबाल की दुकान पर सैकड़ों रेडियो मरम्मत के लिए आते थे।
रेडियो ट्यूनर को सही फ्रीक्वेंसी पर सेट करवाने के लिए ही सही, पर उनकी दुकान गुलजार रहती थी। वे बताते हैं कि रेडियो सुनने वाले कभी-कभार आ जाते हैं, तो मुझे भी अच्छा लगता है। इसी बहाने अपना हुनर काम आ जाता है। पहले के रेडियो क्वायल बेस बनते थे, उनमें मजबूती होती थी। अब तो सारा काम एक प्लेट और आइसी पर रहता है।
रामबाबू वर्मा ने दस साल पहले बनाया था रेडियो, अब टीवी बनाते हैं।
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रोजी-रोटी पर पड़ा भारी असर
इकबाल के ही साथी रामबाबू वर्मा भी वर्षों पहले रेडियो बनाया करते थे। 10 वर्ष पहले आखिरी बार उन्होंने रेडियो बनाया था। वे बताते हैं कि मोबाइल क्या आया, उसने सब खत्म कर दिया। दीवाल की घड़ी, हिंदू कैलेंडर, दीवाल पर परिवार की तस्वीरें टांगना एक शौक हुआ करता था। इस शौक में रेडियो का अलग स्थान था।
देश-दुनिया के समाचार, विविध भारती, क्रिकेट कमेंट्री सब खत्म हो गए। दुनिया इतनी आगे निकल जाएगी हमने कभी नहीं सोचा था। वे बताते हैं कि रेडियो बनाने के हुनर को मैंने टीवी की तरफ लगाया। अब दाल-रोटी का प्रबंध तो हो ही जाता है।