शिवानंद बाबा 1979 में वाराणसी आए। इससे पहले वे कमाख्या (असम), डिब्रुगढ़ फिर वृंदावन रहे। उसके बाद वहां से वाराणसी आए, तब से यहीं रह रहे है। यहीं से सभी जगहों के आश्रमों पर अपने शिष्यों से मिलने जाते हैं। बाबा ने बताया कि 1979 से लेकर 84 तक भेलूपुर पानी टंकी के पास एवं खोजवा स्थित संकुल धारा पोखरा के पास किराये के कमरे में रहे। उसके बाद दुर्गाकुंड स्थित आश्रम पर आए।
योग करते बाबा शिवानंद।
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डिब्रुगढ़ की रहने वाली शिप्रा (62 वर्ष) बताती हैं कि वह दस साल की उम्र से ही बाबा के साथ रह रही हैं। शिप्रा ने कहा कि बाबा को पहली बार देख कर लगा कि इनसे मेरा पूर्व जन्म से ही नाता है। 52 साल हो गए अपने घर नहीं गई। घरवालों एवं रिश्तेदारों से कभी-कभी बात हो पाती है।
वहीं, गुवाहाटी की रहने वाली आदर नाथ (65 वर्ष) बताती हैं कि पति के देहांत के बाद पिछले 25 साल से बाबा के साथ हूं। दो बेटे थे जो अब नहीं रहे एक बेटी है जो अपने पति के साथ कोलकाता में रहती है। बाबा के साथ रहने के बाद ऐसा लगता है जैसे अब किसी भी चीज की कामना नहीं है।