महामना ने दायर की थी दया याचिका
महामना मदन मोहन मालवीय को जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फ ांसी की सजा का पता चला तो बेचैन हो गए। इसके बाद 14 फ रवरी 1931 को वह खुद लॉर्ड इरविन के पास दया याचिका लेकर गए। इसमें उन तीनों की फांसी पर रोक लगाने और उनकी सजा को कम करने का आग्रह किया गया था।
रेकी करने गए थे गोरखपुर
बनारस बार के पूर्व महामंत्री वरिष्ठ अधिवक्ता नित्यानन्द राय और क्रांतिकारियों पर स्वतंत्र रूप से शोध कर रहे नित्यानन्द राय ने बताया कि राजगुरु जन्म से मराठा थे लेकिन कर्मभूमि बनाया बनारस को। भगत सिंह से बहुत पटती थी, बोलते बहुत कम थे एक ही कमजोरी थी सोने की। एक बार की बात है चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह, राजगुरु, शिव वर्मा को सरकारी खजाने की टोह लेने के लिए गोरखपुर भेजा।
राजगुरु हो गए गायब
तीन दिन तक रेकी कर तीनों बनारस लौटने के लिए गोरखपुर स्टेशन पहुंचे। बनारस वाली ट्रेन में देरी थी तो भगत सिंह ने सोचा काम पूरा हो गया है सो लगे हाथ एक मित्र हलधर से क्यों ना मिल लें। शिव वर्मा तो तैयार हो गए, राजगुरु ने इनकार कर दिया। कहा, प्लेटफ ार्म पर पुल के नीचे समय पर मिल जाऊंगा, वहीं आकर ढूंढ लेना। राजगुरु को स्टेशन के बाहर छोङ़कर दोनों चल दिए। ट्रेन कीरवानगी के समय लौटे तो राजगुरुगायब थे। हर जगह ढूंढा, लेकिन नहीं मिले। ट्रेन ने सीटी मारी तो दोनों ट्रेन में सवार हो गए। यह सोचकर कि कहीं ट्रेन में ही बैठा होगा बनारस मिल जाएगा। जब बनारस में भी राजगुरु का पता नहीं चला तो भगत सिंह व शिव वर्मा चिंतित हुए।
दूसरे दिन पहुंचे थे राजगुरु
दूसरे दिन राजगुरु को बनारस स्टेशन पर ट्रेन से उतरता देख भगत सिंह व शिव वर्मा की खुशी का ठिकाना न रहा। राजगुरु ने गुस्से में कहा कि मुझे अकेला छोङ़कर चले आए। यह भी न सोचा कि लौटने के लिए मेरे पास पैसे हैं या नहीं। दूसरे दिन राजगुरु का गुस्सा शांत हुआ। बताया कि गाङ़ी आने में देर थी। मुझे नींद आने लगी। स्टेशन के बाहर तमाम इमली के पेङ़ हैं। मैंने कंबल बिछाया और पेड़ के नीचे सो गया। मुझे सोता छोङ़कर चले कैसे आए। जगाया क्यों नही। राजगुरु भगत सिंह से अक्सर कहते थे, तेरा साथ अंत समय तक नहीं छोङ़ने वाला और अपने वचन की रक्षा भी की और वतन के लिए भगत सिंह के साथ हंसते हंसते फांसी के फं दे को चूम लिया।