आजादी की लड़ाई में काशी ने देश भर में अग्रणी भूमिका निभाई थी। काशी के लाल महान क्रांतिकारी शचींद्र नाथ सान्याल ने जहां चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को क्रांति पथ पर नई दिशा दिखाई, वहीं आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शचींद्र नाथ सान्याल को बनारस के लोगों ने भुला दिया है। हालत यह है कि उनका पुश्तैनी मकान भी बिक गया है और आज वहां दुकानें खुली हैं।
कें द्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलकराज मिश्र ने बताया कि योगी श्यामाचरण लाहिड़ी के मकान डी 31/58 के बगल मे शचींद्र नाथ सान्याल का मकान था। बनारस के अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। संयोग देखिए, लाहिड़ी महाशय का मकान तो आज भी बचा हुआ है। ऐतिहासिक दुर्गा बाड़ी भी आगे मौजूद है, मगर क्रांति के महानायक शचींद्र नाथ के ऐतिहासिक मकान को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ। कभी इसी मकान में रास बिहारी बोस ने फरारी काटी थी। पुलिस के छापे पड़ते थे और अंग्रेजों ने इसे सील कर दिया था। दुर्भाग्य है कि उस भवन को तोड़कर एक व्यावसायिक भवन में तब्दील कर दिया गया है।
15 साल की उम्र में कूद गए थे आजादी की लड़ाई में
मदनपुरा मोहल्ले में तीन अप्रैल 1893 में शचींद्र नाथ सान्याल का जन्म हुआ था। ब्रितानिया हुकुमत ने जंगे आजादी के इस सिपाही को कालापानी के लिए अंडमान निकोबार के सेल्युलर जेल भेज दिया था। महज 15 साल की उम्र में शचींद्र नाथ सान्याल अपने तीन भाइयों के साथ आजादी की लङ़ाई में कूद गए थे। सान्याल ने आजाद हिंद फौज और गदर पार्टी के संस्थापक रास बिहारी बोस के साथ मिलकर उत्तर भारत में क्रांति की अलख जगाई और काशी को क्रांति का केंद्र बनाया।
बनारस में ही हुए थे गिरफ्तार
शचींद्र नाथ सान्याल रास बिहारी बोस के दाहिने हाथ थे। 1857 की क्रांति की तरह 21 फरवरी 1915 को क्रांतिकारियों ने सशस्त्र सैनिक विद्रोह की तैयारी की थी, मगर अंग्रेजों को षडयंत्र की जानकारी हो गई। रास बिहारी बोस शचींद्र के मदनपुरा वाले मकान में लगभग एक साल फरारी हालात में रहे। अप्रैल 1915 में रास बिहारी के विदेश जाने के कुछ दिन बाद सान्याल बनारस मे गिरफ्तार हो गए। मुकदमे में आजीवन कालापानी की सजा हुई और सारी संपत्ति की जब्ती का आदेश हुआ।
सड़क से घर तक दौड़ते हुए पहुंचे
विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद फरवरी 1920 में सान्याल रिहा हुए और बनारस पहुंचे। अपने घर की गली में सान्याल पहुंचे तो उनके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे, वे सङ़क से गली में स्थित मकान तक दौड़ते हुए पहुंचे। भाई और मां ने उनका स्वागत किया। इसके बाद सान्याल फिर अपने मिशन पर लग गए।