18 को जब कोरोना की रिपोर्ट आई तो वो पॉजिटिव थे। 18 की रात 12 बजे के बाद उनकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी तो 19 की सुबह ही हम लोगों ने उन्हें जिला अस्पताल के कोविड वार्ड में एडमिट कराया। पति को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। इसलिए डॉक्टरों ने उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा था, लेकिन ऑक्सीजन लेवल लगातार घटता जा रहा था। आखिरकार 11 दिनों तक कोरोना से जंग लड़ते लड़ते एक मई को वो जिंदगी की जंग हार गए। डॉक्टरों ने जब उनके मरने की सूचना दी तो आखों के सामने अंधेरा छा गया, लगा जिंदगी खत्म हो गई, पंचायत चुनाव ने मेरे साथ मेरे बच्चों की खुशियां छीन ली।
बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिंता -
अनुपमा बताती हैं मेरा बड़ा बेटा 8 साल का और छोटा बेटा अभी सिर्फ 3 साल का है। अब पढ़ाने, लिखाने व काबिल बनाने की जिम्मेदारी समय से पहले उनके कंधों पर आ गई है। वह कहती है कि जब तक कोई सरकारी मदद व मृतक आश्रित के रूप में सरकारी नौकरी नहीं लगेगी, तब तक परिवार को आर्थिक संकट से भी गुजरना पड़ रहा है। इतनी छोटी उम्र में बच्चों को पिता का प्यार भी नसीब नहीं हो सका।
राजेश कुमार की पत्नी अनुपमा ने बताया कि मृतक आश्रित कोटे से विभाग में नौकरी के लिए आवेदन कर दिया है। मेरी योग्यता एमए व बीएड की है। इसलिए टीईटी उत्तीर्ण करने का समय मांगा है। विभाग की ओर से अभी इस पर कोई जवाब नहीं आया है।