वाराणसी। गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि में रामराज्य का मूल अर्थ प्रत्येक नागरिक की प्रसन्नता, सर्वजन हिताय की भावना और शोषणमुक्त समाज की स्थापना है। यह विचार संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने तुलसी जयंती के अवसर पर तुलसीघाट पर आयोजित धर्मनिरपेक्षता व रामराज्य विषयक संगोष्ठी के दौरान व्यक्त किए। कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए प्रो. मिश्र ने कहा कि वर्तमान दौर में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को संकुचित या नकारात्मक संदर्भों में देखा जाने लगा है, जबकि भारत की मूल आत्मा ही सबको समाहित कर साथ चलने की रही है।
उन्होंने आगे कहा कि काशी से प्राप्त ज्ञान और जीवनानुभवों के कारण गोस्वामी जी का ''''श्रीरामचरितमानस'''' अत्यंत व्यावहारिक और वैज्ञानिक ग्रंथ के रूप में स्थापित हुआ। ऐसा समाज जहां कोई दुखी न हो, सभी परस्पर सद्भाव और अपने कर्तव्यों के साथ जिएं, वही वास्तविक रामराज्य है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलसीदास के दिखाए मार्ग का अनुसरण अत्यंत प्रासंगिक है। संगोष्ठी में प्रो. श्रीनिवास पांडेय, जगदीश चन्द्र त्रिपाठी, प्रो. एन.के. दुबे, प्रो. उपेंद्र पांडेय और अनूप मिश्र सहित अनेक गणमान्य विद्वानों ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन राघवेंद्र पांडेय द्वारा किया गया।
वंचितों के हितैषी तुलसी के राम
बीएचयू के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अनूप वशिष्ठ ने कहा कि मांगि कै खैबो, मसीत को सोइबो... जैसे पद तुलसीदास की सर्वसमावेशी व पंथ निरपेक्ष सोच का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि तुलसी के राम ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित वर्ग को अपना सखा बनाया। विद्वान पुण्डरीक शास्त्री ने रेखांकित किया कि रामचरितमानस सगुण और निर्गुण भक्ति परंपरा का अद्भुत संगम है। साथ ही, ग्रंथ में 22 हजार उर्दू-फारसी शब्दों की सहज उपस्थिति इसकी भाषाई उदारता को दर्शाती है।