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अब चकिया-नौगढ़ के जंगल मे नहीं सुनाई देती 'राजा-रानी' और 'जयश्री' की दहाड़

Sat, 25 Jan 2020 02:42 PM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, चंदौली
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नौगढ़ जंगल में वाटर फॉल। - फोटो : अमर उजाला।
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काशी वन्य जीव प्रभाग के 74 हजार हेक्टेयर में फैले वन क्षेत्र में अब सिंह की दहाड़ नहीं सुनाई पड़ती। वन क्षेत्र कभी-कभार बिहार या झारखंड के जंगलों से भटक कर आए बाघ की दहाड़ से गूंजता है। बाघों एवं शेरों के शिकार के चलते 1980 के दशक में बाघों की प्रजाति बिलुप्त हुई थी। अब वन क्षेत्र में केवल तंदुआ की गुर्राहट ही सुनाई देती है।

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काशी का वन क्षेत्र सरकार के हाथ में आने के पूर्व काशी नरेश की निजी संपत्ति था। भारत संघ में काशी राज्य के विलय के बाद काशी का वन क्षेत्र (जो कि वर्तमान में चंदौली जिले में स्थित है) उत्तर प्रदेश सरकार के हाथ में चला गया। सरकार के हाथ में वन क्षेत्र के जाने के दौरान बड़ी संख्या में बाघों का प्रवास वन क्षेत्र में था। 24 मई 1957 को उत्तर प्रदेश सरकार के शासनादेश के अनुसार काशी वन प्रभाग में चंद्रप्रभा वन्य जीव बिहार की स्थापना की गई थी।

वन्य जीव बिहार की स्थापना होने के बाद 2 दिसंबर 1957 को इस वन क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद ने अपने हाथों से गुजरात के गिर वन क्षेत्र से लाए गए एक नर और 2 मादा बब्बर शेरों को वन्य जीव बिहार में छोड़कर वन्य जीव बिहार का उद्घाटन किया था। राजा, रानी और जयश्री नाम के ये बब्बर शेर जंगल में स्वच्छंद वितरण करते थे। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़कर 11 तक पहुंच गई थी।

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वहीं वन क्षेत्र में परंपरागत बाघों की बड़ी संख्या भी मौजूद थी। लेकिन खुला वन क्षेत्र होने तथा कर्मचारियों की कम संख्या के कारण शेरों एवं बाघो के शिकार में तेजी रही। इसके चलते शेरो के साथ ही बाघो की प्रजातियां इस वन क्षेत्र से बिलुप्त हो गईं। 1970 की वन्य जीव गणना में वन्य जीव प्रतिपालक की रिपोर्ट के अनुसार एक्का-दुक्का शेर ही वन क्षेत्र में रह गए थे। धीरे-धीरे उनका भी अस्तित्व समाप्त हो गया। वर्ष 1982 में बाघों की संख्या वन क्षेत्र में बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चंद्रप्रभा वन्य जीव बिहार में लायन सफारी बनाने की घोषणा की गई थी, जो मूर्त रूप नहीं ले सकी।

काशी वन्य जीव प्रभाग के डीएफओ रहे रमेश कुमार पाण्डेय ने सन 2000 में शासन को भेजे अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वनों पर बढ़ रहे जनसंख्या के दबाव के कारण बाघों की प्रजाति बिलुप्त हो गई है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार कभी-कभार वन क्षेत्र में बिहार तथा झारखंड के वनों से आने वाले बाघों की सूचना मिलती है।
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डीएफओ आशुतोष जायसवाल के अनुसार वन क्षेत्र में मानवो की आमदरफ्त बढ़ने तथा पालतू पशुओ के जंगल में चरने के कारण वन क्षेत्र से बाघो का अस्तित्व समाप्त हो गया है। अब वन क्षेत्र में बाघ की प्रजाति का तेंदुआ ही देखा जा रहा है।
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