वहीं वन क्षेत्र में परंपरागत बाघों की बड़ी संख्या भी मौजूद थी। लेकिन खुला वन क्षेत्र होने तथा कर्मचारियों की कम संख्या के कारण शेरों एवं बाघो के शिकार में तेजी रही। इसके चलते शेरो के साथ ही बाघो की प्रजातियां इस वन क्षेत्र से बिलुप्त हो गईं। 1970 की वन्य जीव गणना में वन्य जीव प्रतिपालक की रिपोर्ट के अनुसार एक्का-दुक्का शेर ही वन क्षेत्र में रह गए थे। धीरे-धीरे उनका भी अस्तित्व समाप्त हो गया। वर्ष 1982 में बाघों की संख्या वन क्षेत्र में बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चंद्रप्रभा वन्य जीव बिहार में लायन सफारी बनाने की घोषणा की गई थी, जो मूर्त रूप नहीं ले सकी।
काशी वन्य जीव प्रभाग के डीएफओ रहे रमेश कुमार पाण्डेय ने सन 2000 में शासन को भेजे अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वनों पर बढ़ रहे जनसंख्या के दबाव के कारण बाघों की प्रजाति बिलुप्त हो गई है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार कभी-कभार वन क्षेत्र में बिहार तथा झारखंड के वनों से आने वाले बाघों की सूचना मिलती है।
डीएफओ आशुतोष जायसवाल के अनुसार वन क्षेत्र में मानवो की आमदरफ्त बढ़ने तथा पालतू पशुओ के जंगल में चरने के कारण वन क्षेत्र से बाघो का अस्तित्व समाप्त हो गया है। अब वन क्षेत्र में बाघ की प्रजाति का तेंदुआ ही देखा जा रहा है।