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गणतंत्र के पहरुए: परिवार और खुद का दर्द भूल, सेवा को बनाया मिशन, कोरोना काल में भी नहीं हारी हिम्मत

Mon, 24 Jan 2022 02:32 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

हिम्मत और जज्बे का नाम है ‘कोरोना वारियर्स’। जिस कोरोना संक्रमण का नाम सुनते ही लोगों में भय दिखने लगता है। उसी संक्रमण काल में कोरोना योद्धा सड़कों, अस्पतालों में मोर्चा संभाले रहे हैं। 
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कोरोना वारियर्स - फोटो : फाइल
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विस्तार
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हिम्मत और जज्बे का नाम है ‘कोरोना वारियर्स’। जिस कोरोना संक्रमण का नाम सुनते ही लोगों में भय दिखने लगता है। उसी संक्रमण काल में कोरोना योद्धा सड़कों, अस्पतालों में मोर्चा संभाले रहे हैं। किसी ने अपने दो साल के बच्चे को छोड़ अस्पताल में मरीजों की सेवा की और अब भी डटे हुए हैं तो कोई अपनी बीमार माता-पिता की सेवा करने के साथ जनता को सुरक्षा का एहसास कराने में लगा रहा। आज इनकी बदौलत ही देश कोरोना से जंग लड़ रहा है और बहुत हद तक कामयाबी भी मिली है।

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डॉक्टर और पिता की निभाई दोहरी जिम्मेदारी
पीएचसी सेवापुरी के प्रभारी डॉ. यतीश भुवन पाठक एक ऐसे चिकित्सक हैं, जिन्होंने एक चिकित्सक के रूप में मरीज के साथ-साथ एक पिता की जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन किया। आज भी गांव में घर-घर कोरोना जांच हो या टीकाकरण अभियान कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण में डटे हुए हैं।

डॉ. पाठक कोरोना की पहली लहर में ड्यूटी निभाते हुए नवंबर महीने में संक्रमित भी हुए। 14 दिनों के होम आइसोलेशन में रहने की जगह मरीजों की सेवा करने को वह दस दिनों में ही पूरी तरह स्वस्थ होकर कोरोना से चल रही जंग के लिए मैदान में लौट आए। इस दौरान उन्हाेंने अपनी दो बेटियों ईरा व ईशी के लिए पिता की भी जिम्मेदारी निभाई।

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घरवालों की परवाह किए बिना सेवा को बनाया मिशन

कोरोना की पहली और दूसरी लहर में एक समय ऐसा था जब एक दिन में 1000 से 1500 केस मिल रहे थे। लोगों का घरों से निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। उस समय स्वास्थ्यकर्मी ही थे जो घरवालों की परवाह किए बिना सेवा को मिशन के रूप में काम करते रहे। सीएमओ कार्यालय में तैनात कर्मचारी संजय साहू इनमें से एक हैं।

तीसरी लहर में भी वह पूरी सजगता से डयूटी में लगे हैं। दूसरी लहर में ड्यूटी के दौरान ही संजय न जाने कैसे संक्रमित हो गए, कामकाज के दौरान पता नहीं चला। यहीं नहीं होम आइसोलेशन में रहने के दौरान तबीयत बिगड़ गई तो दीनदयाल अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। अपने छह साल के बेटे प्रांजल और पत्नी प्रीति को गांव में छोड़कर अपना फर्ज निभाते रहे। ठीक होकर लौटने के बाद अब भी वह सेवा को मिशन के रुप में मानते हुए काम में लगे हैं। 
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कर्म से नहीं हटे पीछे, वर्चुअल तरीके से थे डटे

कोरोना संक्रमण की जंग में चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों के साथ ही पुलिसकर्मियों ने भी एक योद्धा की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाई। पहली और दूसरी लहर की तरह की तीसरी लहर में भी कई पुलिसकर्मी संक्रमित हुए हैं। इसमें से एक अपर पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था अनिल कुमार सिंह हैं।

कमिश्नरेट की कानून व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने के दौरान वे संक्रमित हुए लेकिन कोविड गाइडलाइन का पालन करते हुए खुद को होम आइसोलेट किया और कानून व्यवस्था में किसी भी तरह की कोई ढील नहीं आने दी।
फोन पर और वर्चुअल तरीके से घर से ही कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अपने मातहतों संग जुड़े हुए थे। उन्हें समय-समय पर फोन से गाइड करते रहे और इस तरह अपने फर्ज और कर्तव्य को भी निभाया। होम आइसोलेट होते हुए भी कमिश्नरेट की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी बखूबी निभाई।
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