प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा, तुरत दिब्य सिंघासन मागा। रबि सम तेज सो बरनि न जाई, बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई। अर्थात प्रभु को देखकर मुनि वशिष्ठजी के मन में प्रेम भर आया। उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मंगवाया जिसका तेज सूर्य के समान था। उसके सौंदर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्री रामचंद्रजी उस सिंहासन पर विराजमान हुए। चारों दिशाएं उनकी जय-जयकार से गुंजायमान हो उठीं।
सोमवार को श्री गोस्वामी तुलसीदास रामलीला समिति व चित्रकूट रामलीला में राम राज्याभिषेक की लीला का मंचन व झांकी सजाई गई। राम को राजगद्दी मिलते ही अयोध्या में खुशी की लहर दौड़ गई। जयकारे से वातावरण गूंज उठा। शुभ मुहूर्त में भगवान श्रीराम को राजगद्दी दी गई। इस मौके पर सभी को उपहार प्रदान कर राम ने सम्मानित किया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने रत्नजड़ित माला सीता को प्रदान की। सीता ने वह माला अपनी तरफ से हनुमान जी को दे दिया।
माला प्राप्त करने के बाद हनुमान ने माला को उलट-पलट कर देखना शुरू कर दिया। माला के एक-एक रत्नों को तोड़कर फेंक दिया। यह देख राम दरबार में मौजूद लोगों को आश्चर्य हुआ। माला तोड़ने का कारण पूछने पर हनुमान ने कहा कि मैं प्रभु राम को ढूंढ रहा हूं। यह सुनते ही दरबारी हंसने लगे। एक दरबारी ने हनुमान से पूछा कि क्या तुम्हारे हृदय में प्रभु निवास करते है। यह सुनकर हनुमान ने हां कहते हुए अपना सीना फ ाड़कर भरे दरबार में अपने हृदय में सीताराम का दर्शन कराया। हनुमान के हृदय में सीताराम को देख सभी ने जयकारे लगाए। स्वरूपों की आरती उतारी गई।