सर्दी हो गर्मी, बच्चों को फर्श पर बैठना मजबूरी है। परिषदीय विद्यालयों के कायाकल्प की योजना दो वर्षों से चल रही है, लेकिन शानदार अतीत वाले इस विद्यालय पर किसी की नजर नहीं है। उपेक्षा का ही आलम है कि यहां बच्चों की संख्या भी निरंतर कम होती जा रही है। फिलहाल 52 बच्चे हैं, जबकि 2018 तक 75 से अधिक बच्चों का पंजीकरण था।
52 बच्चे और चार शिक्षक
विद्यालय के कक्षा एक में 12, दो में आठ, तीन में 12, चार में 9 और पांचवीं में दस समेत कुल 52 बच्चे हैं। इन्हें पढ़ाने के लिए यहां एक हेड मास्टर के अलावा दो महिला शिक्षक और एक शिक्षामित्र की तैनाती की गई है। इन चार शिक्षकों की कोशिशों के बाद भी विद्यालय में बच्चों का नामांकन नहीं बढ़ पा रहा। बदहाली के शिकार विद्यालय में अभिभावक भी बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं है।
देश ही नहीं, विदेशों में भी सेवा दे चुके हैं छात्र
प्राथमिक विद्यालय गद्दीपुर द्वितीय से प्रारंभिक शिक्षा हासिल कर उच्च पदों पर पहुंचने वालों की फेहरिश्त लंबी है। इंदू प्रकाश सिंह कई देशों में राजदूत रहे। विनय सिंह बिहार सरकार तो छत्रसाल सिंह कर्नाटक सरकार के मुख्य सचिव, देवेंद्र नाथ सिंह गुजरात में प्रमुख सचिव रह चुके हैं। ओमप्रकाश सिंह कुमाऊं विवि के कुलपति रहे। अजय प्रकाश सिंह, विद्याप्रकाश सिंह आईएएस, प्रेमचंद्र सिंह आईपीएस पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।
रवि प्रकाश सिंह अमेरिका सरकार में अधिकारी रहे तो डॉ. जितेंद्र नाथ सिंह आस्ट्रेलिया में सर्जन हैं। जयंत कुमार सिंह, सुमंत सिंह भी विदेशों में कारोबार कर रहे हैं। इनके अलावा भी कई नाम हैं, जिसे अब तक सूचीबद्ध नहीं किया गया है। विभिन्न कॉलेजों में प्रोफेसर, पीसीएस अधिकारियों की भी लंबी कतार है।
ब्लॉक से जिले तक लगाई दौड़, नहीं हुआ समाधान
विद्यालय के हेड मास्टर अरविंद सिंह का कहना है कि यह गौरव की बात है कि इस विद्यालय में पढ़ने वाले बड़े पदों पर पहुंचे हैं, लेकिन आगे बढ़ने के बाद किसी ने भी पलट कर इस ओर नहीं देखा। कोई भी एक नजर डाल दें तो विद्यालय का कायाकल्प हो जाए। स्वर्णिम अतीत वाले विद्यालय के उद्धार के लिए ब्लाक से लेकर जिले तक भागदौड़ कर चुके हैं। प्रधान अब इसे नवसृजित कजगांव नगर पंचायत में शामिल होने की दलील देते हुए काम कराने में असमर्थता जता रहे हैं।
सबसे बड़ी समस्या रास्ते की हैं। अमेरिका में अधिकारी रहे स्व. रवि प्रकाश सिंह इस विद्यालय के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। वह लगातार फोन से भी संपर्क कर जरुरतों को पूरा करने का प्रयास करते थे। उनकी पहल पर ही चार बार पैमाइश भी हुई, लेकिन बात नहीं बन पाई। गांव के लोगों का ऊंचे पदों पर होना खासियत है तो यही खामी भी है।
गांव में चकबंदी नहीं है। विद्यालय के दोनों तरफ निजी जमीन है। कई बार पैमाइश कराई गई, लेकिन विवाद के चलते रास्ता नहीं मिल पाया। विद्यालय अब नगर क्षेत्र में आ गया है। यहां अन्य सुविधाएं सुदृढ़ करने के लिए कार्ययोजना बनाकर शीघ्र काम कराया जाएगा। -प्रवीण कुमार तिवारी, बीएसए, जौनपुर।