नारद पुराण के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत आज मनाया जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन उपवास करके रात में सोए हुए भगवान को गीत आदि मांगलिक उत्सवों के द्वारा जगाने का विधान है। ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर जातक को परम लोक प्राप्ति का वरदान देते हैं।
पर्व के बारे में बताते हुए ज्योतिष शिरोमणि डा. शैलेश मोदनवाल कहते हैं कि चार महीने शयन के बाद एकादशी की रात्रि को भगवान विष्णु अपने योग निद्रा से जागते हैं। नारद पुराण के उत्तर भाग में एकादशी व्रत महात्म्य के विषय में कहा गया है कि एकादशी से अधिक पवित्र न गंगा है, न गया है, न काशी है, न पुष्कर। कुरुक्षेत्र, नर्मदा, देविका, यमुना तथा चंद्रभाग भी एकादशी से बढ़कर पुण्यमय नहीं हैं।
पं. जितेंद्र शुक्ल के अनुसार एकादशी व्रत करने वाला पुरुष मातृकुल, पितृकुल तथा पत्नीकुल की दस-दस पीढिय़ों का उद्धार कर देता है। एकादशी व्रत स्वर्ग और मोक्ष को देने वाला है। एकादशी व्रत को करने वाला सब पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है।
डॉ. टीपी त्रिपाठी के अनुसार पर्व के दिन चारों वेदों के विविध मन्त्रों तथा वाद्य यन्त्रों के द्वारा भगवान लक्ष्मी पति को जगाना चाहिए। द्राक्षा, ईख, अनार, केला और सिंघाड़ा आदि वस्तुएं भगवान को अर्पित करनी चाहिए।
रात्रि बीतने के पश्चात दूसरे दिन भगवान श्रीमन्नारायण की पुरूष सूक्त के मन्त्रों के द्वारा षोड्शोपचार विधि से पूजा कर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। इस प्रकार विधान से इस व्रत का पालन करने पर श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।